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जलियावाला बाग़ हत्याकांड – The Credible History https://thecrediblehistory.com People’s history in people’s language Fri, 01 Nov 2024 09:22:20 +0000 en-US hourly 1 https://thecrediblehistory.com/wp-uploads/2023/05/cropped-cropped-LogoTCH-32x32.png जलियावाला बाग़ हत्याकांड – The Credible History https://thecrediblehistory.com 32 32 भील आंदोलन के नायक मोतीलाल तेजावत https://thecrediblehistory.com/2024/11/motilal-tejawat-hero-of-bhil-movement/ https://thecrediblehistory.com/2024/11/motilal-tejawat-hero-of-bhil-movement/#respond Fri, 01 Nov 2024 07:37:03 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=9012 बिजोलिया के किसान सत्याग्रह ने राजस्थान में पहली बार जनचेतना की अलख जगाई और लंबे संघर्ष के बाद सफलता पाई। राजस्थान में सामंती शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध अहिंसक आंदोलनों की शुरुआत का श्रेय मोतीलाल तेजावत को दिया जाता है।

भील नेता मोतीलाल तेजावत ने राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया। जिस आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व किया, उसमें भीलों का महत्वपूर्ण योगदान था। भील, आदिवासी समुदाय का हिस्सा होते हुए सदियों से शोषण और उत्पीड़न के शिकार रहे थे और किसी ऐसे नेता की प्रतीक्षा कर रहे थे जो उन्हें इससे मुक्ति दिला सके।  मोतीलाल तेजावत का जन्म मेवाड़ के भील क्षेत्र में हुआ था। बड़े होने पर वे एक जागीरदार के कामदार बने, जहाँ उन्होंने देखा कि मेवाड़ के महाराणा के शिकार दौरों के दौरान बेगार प्रथा के नाम पर लोगों को कितने कष्ट सहने पड़ते हैं। यह देखकर उन्होंने राज्य की नौकरी छोड़ दी।

उसी समय देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। मोतीलाल तेजावत ने मेवाड़ का नेतृत्व किया और अपने समूह के साथ महाराणा की सेवा में उपस्थित होकर किसानों की मांगें रखीं। महाराणा ने उनकी मांगें स्वीकार कर लीं, जो तेजावत जी की पहली जीत थी।

इस पहली सफलता के बाद मोतीलाल तेजावत भील क्षेत्र में भ्रमण करने लगे। उनके पास भीलों के लिए एक ही संदेश था: “यदि वे अन्याय, अत्याचार, शोषण, और उत्पीड़न से मुक्त होना चाहते हैं, तो एकता के सूत्र में बंध जाएं।” इस प्रकार भील आंदोलन “एकी आंदोलन” का रूप ले चुका था, जो आसपास की रियासतों में भी तेजी से फैलने लगा।

इस आंदोलन ने रियासती शासकों को हिला दिया; कई जगह उनके सिंहासन डगमगाने लगे। कहीं उन्होंने समझौता करने की चेष्टा की, तो कहीं दमन का सहारा लिया। एक जागीरदार ने मोतीलाल तेजावत को गोली मारने की साजिश रची, पर वह इसमें असफल रहा।


खिलाफत कॉन्फ्रेंस और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद


नीमड़ा का नरसंहार

नीमड़ा का नरसंहार
नीमड़ा का नरसंहार

इस आंदोलन के दौरान गुजरात की विजयनगर रियासत में एक हत्याकांड हुआ, जो अपनी भयावहता में जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी अधिक था। राज्य के नीमड़ा गांव में बड़ी संख्या में भील एकत्र थे, और वहां विभिन्न रियासती सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ मोतीलाल तेजावत की समझौता वार्ता चल रही थी। रियासतों की सेनाएं भी वहां तैनात थीं। अचानक, रियासती सैनिकों ने निहत्थे भीलों पर गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीकांड में करीब 1200 भील मारे गए, और तेजावत भी घायल हो गए। समझौता वार्ता टूट गई, और भील तेजावत को सुरक्षित स्थान पर ले गए।

इसके बाद मोतीलाल तेजावत का आठ वर्षों का अज्ञातवास काल शुरू हुआ, जिसमें एक भील समूह हमेशा उनके साथ रहता और उनकी सुरक्षा करता। 1922 में, जब तेजावत अज्ञातवास में थे, सिरोही रियासत के दीवान रमाकांत मालवीय उनसे मिलने उनके शिविर में पहुंचे। उस समय राजस्थान सेवा संघ के अध्यक्ष विजयसिंह पथिक अपने साथियों के साथ समझौता वार्ता में सहायता के लिए वहां मौजूद थे। मालवीय को तलवारों के साये में होकर गुजरना पड़ा, और दंगा न करने की शपथ लेनी पड़ी। हालांकि, समझौता हुआ, पर उसका पालन नहीं हुआ।

इसके बाद, एक अंग्रेज अधिकारी के नेतृत्व में भीलों पर हमला हुआ, और सिरोही रियासत के दो भील गांव—भूला और बालोलिया—जला दिए गए। भीलों का सारा अनाज नष्ट कर दिया गया, और उनके मवेशियों को घायल कर दिया गया। इस हमले में कई भील मारे गए और कई घायल हुए। इसे सिरोही भील हत्याकांड के नाम से जाना जाता है, जिसकी देश-विदेश में निंदा हुई। राजस्थान सेवा संघ ने इस घटना के बाद पीड़ित भीलों के लिए सहायता कार्य भी संगठित किया।

मोतीलाल तेजावत द्वारा संचालित भील आंदोलन का एक सामाजिक पहलू भी था। वे भीलों को शराब और मांस के सेवन की बुराइयों को त्यागने का उपदेश देते थे। इस प्रकार, भील आंदोलन समाज सुधार का आंदोलन भी था।


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गांधीजी के सलाह पर आत्मसमर्पण किया था मोतीलाल तेजावत ने

जब महात्मा गांधी को भील आंदोलन के बारे में अवगत कराया गया, उन्होंने मणिलाल कोठारी के माध्यम से मोतीलाल तेजावत को पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण का परामर्श दिया। तेजावत ने यह सलाह मान ली और लगभग सात वर्ष के अज्ञातवास के बाद, 1929 में ईडर रियासत के खेड़ब्रह्मा गांव में पुलिस के हवाले कर दिया। ईडर रियासत उन पर मुकदमा नहीं चलाना चाहती थी और उसने अन्य रियासतों से पूछा कि यदि वे चाहें तो तेजावत को उनके सुपुर्द किया जा सकता है। केवल उदयपुर रियासत ने उनकी मांग की और उन्हें वहां भेजा गया।

इसके साथ ही  तेजावत का लंबा जेल जीवन शुरू हुआ। उन्हें 6 अगस्त 1929 से 23 अप्रैल 1936 तक उदयपुर की सेंट्रल जेल में कैद रखा गया। रिहाई के बाद उन पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि वे उदयपुर की नगरपालिका सीमा से बाहर नहीं जाएंगे। 1938 में जब मेवाड़ प्रजामंडल का आंदोलन शुरू हुआ, तो  तेजावत ने इसमें भाग लिया और गिरफ्तार भी हुए, लेकिन कुछ समय बाद रिहा कर दिए गए।

अगस्त 1942 में मेवाड़ प्रजामंडल ने “अंग्रेजों, भारत छोड़ो” आंदोलन के दौरान महाराणा को अंग्रेजों से संबंध तोड़ने का नोटिस दिया। इस पर तेजावत को तीन वर्षों के लिए नजरबंद कर दिया गया, और 1945 में रिहाई के बाद, उन्हें पुनः उदयपुर की नगरपालिका सीमा के भीतर रहने का प्रतिबंध लगा दिया गया, जो भारत की स्वतंत्रता तक जारी रहा।

मोतीलाल तेजावत ने गांधीजी के परामर्श पर आत्मसमर्पण किया था।  गांधीजी ने सार्वजनिक रूप से उदयपुर रियासत के अधिकारियों से तेजावत की रिहाई का अनुरोध किया ताकि वे भील समुदाय में अपना समाज सुधार कार्य जारी रख सकें। लेकिन उदयपुर रियासत ने गांधीजी के इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और तेजावत को जेल में बंद रखकर प्रतिशोध की भावना को संतुष्ट किया।

स्वतंत्रता संग्राम में तेजावत की सक्रिय भूमिका थी। उन्होंने मेवाड़ प्रजामंडल द्वारा छेड़े गए सत्याग्रह आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। मोतीलाल तेजावत महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने भील जाति जैसी युद्ध-जीवी जाति के लाखों लोगों को अहिंसक आंदोलन में ढाला। रियासतों द्वारा किए गए नृशंस हत्याकांडों के बावजूद, वे अहिंसा के मार्ग पर अडिग रहे।

मोतीलाल तेजावत का जीवन भील आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ था। यह स्वतंत्रता काल का एक महान आंदोलन था, जिसमें लाखों स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया और कुर्बानियां दीं। तेजावत का जीवन आज भी भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

मोतीलाल तेजावत और महात्मा गांधी
मोतीलाल तेजावत और महात्मा गांधी

संदर्भ

जैन, फूलचंद एवं कपूर, मस्तराम — स्वतंत्रता सेनानी ग्रंथमाला-7, क्रांतिकारी आंदोलन: सप्रसिद्ध क्रांतिवीर, नई दिल्ली: कन्सेप्ट पब्लिशिंग कम्पनी

कांकरिया, प्रेमसिंह — भील क्रांति के प्रणेता: मोतीलाल तेजावत। उदयपुर: राजस्थान साहित्य अकादमी, 1985

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जब टैगोर ने जताई थी गांधी के विचारों से असहमति https://thecrediblehistory.com/2024/10/when-tagore-expressed-disagreement-with-gandhis-ideas/ https://thecrediblehistory.com/2024/10/when-tagore-expressed-disagreement-with-gandhis-ideas/#respond Wed, 09 Oct 2024 09:06:51 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=8646 जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधीजी  ने अंग्रेज़ों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी थी । आंदोलन का नाम था असहयोग आंदोलन । आंदोलन को पूरे भारत में काफी सफलता मिली लेकिन गोरखपुर के चौरी चौरा में एक भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिस वालों की मौत हो गई। गांधीजी ने इस घटना के बाद आंदोलन को वापस ले लिया ।

गांधीजी  को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया । लेकिन फरवरी 1924 में उनके खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया । बाहर आकर गांधीजी ने ‘चरखा आंदोलन’ शुरू कर दिया।

रवींद्रनाथ टैगोर गांधीजी के समय के काफी मशहूर कवि थे। उन्होंने गांधीजी के न सिर्फ चरखा आंदोलन और असहयोग आंदोलन पर बल्कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भी लेख लिखकर आलोचना की। उन्होंने लिखा कि जैसे कुछ लोगों के लिए उनकी आजीविका है वैसे ही कुछ लोगों के लिए राजनीति है जहां वो अपने देशभक्ति की विचारधारा का व्यापार करते हैं।

रवीन्द्रनाथ ने जब यह देखा कि पूरे जोश खरोश के साथ असहयोग आंदोलन  शुरू हो रहा है, तो वे ऐसा लिखने के लिये बाध्य हुए-सारे भारत में उस समय हलचल मची हुई थी — कहीं ख़िलाफ़त के नाम पर, कहीं पंजाब की नृशंसता के कारण शरीर से दुर्बल भारतवासियों के लिए इस तरह उन्मत्त होना कितना हानिकर हो सकता है, यह सोचकर रवीन्द्रनाथ शंकित हुए।

उन्होंने चाहा कि लोग असंभव प्रतिकार करने का ख़याल छोड़कर और बदला लेने की इच्छा स्थगित रखकर इस समय इस महान् देश की मनोरचना में लग जायें। गांधीजी के विचारों और कार्यों में आत्मत्याग की जो प्रज्वलित वह प्रतिफलित हैं, उसके लिए रवीन्द्रनाथ के मन में असीम श्रद्धा का भाव है (2 मार्च 1921) को लिखे एक पत्र में उन्होंने इस संबंध में विस्तारपूर्वक लिखा था- जिसमें असहयोग की नयी निषेधात्मक नीति के प्रति उनके मन में वैसी ही उपेक्षा का भाव था।

Tagore-Gandhi-and-British-missionary-Charles-Freer-Andrews-discussing-the-non-cooperation-movement-in-Calcutta-on-September-6-1921-a-watercolour-by-Abanindranath-Tagore-National-Library
Tagore-Gandhi-and-British-missionary-Charles-Freer-Andrews-discussing-the-non-cooperation-movement-in-Calcutta-on-September-6-1921-a-watercolour-by-Abanindranath-Tagore-National-Library

 

गांधीजी के असहयोग आंदोलन पर टैगोर 

स्वराज क्या है! माया है, धुंध है जो कि खुद खत्म हो जाएगा उस अविनाशी पर बिना कोई असर डाले।  हालांकि हम अपने आप इस झूठ का विश्वास दिला सकते हैं कि स्वराज हमारा उद्देश्य नहीं है । हमारी लड़ाई आध्यात्मिक लड़ाई है। यह लोगों के लिए है। हमें लोगों को उनकी खुद की अज्ञानता से मुक्त कराना होगा ।हमें तितली को यह विश्वास दिलाना होगा कि आकाश की स्वतंत्रता कोकून के शरण से बेहतर है।

नेशनलिज़म या राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर ने कहा कि हमारी भाषा में ‘नेशन’ के लिए कोई शब्द नहीं है ।जब हम दूसरों ये शब्द उधार लेते हैं तो यह हमारे लिए सटीक नहीं बैठता।

(मई 1921 में ‘माडर्न रिव्यू’ में प्रकाशित)

टैगोर द्वारा असहयोग आंदोलन की आलोचना में गांधी जी का उत्तर

मैं समझता हूं कि कवि ने अनावश्यक रूप से असहयोग आंदोलन के नकारात्मक पक्ष को उभारा है । हमने ‘न’ कहने की शक्ति खो दी है । सहयोग न करना ऐसा ही है जैसे खेत में बीज बोने से पहले किसान खरपतवार को साफ करता है। खरपतवार को साफ करना काफी ज़रूरी है । यहां तक कि जब फसल बढ़ रही हो तो भी ये ज़रूरी होता है । असहयोग का अर्थ है कि लोग सरकार से संतुष्ट नहीं हैं।

देश ने गैर- नुकसानदायक, प्राकृतिक और धार्मिक असहयोग का रास्ता चुना है न कि हिंसा का अधार्मिक रास्ता और, अगर देश कभी भी कवि के स्वराज को प्राप्त कर पायेगा तो यह   असहयोग और अहिंसक आंदोलन से ही होगा।

(1 जून 1921 को ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित किए गए आर्टिकिल ‘द पोएट ऐंक्ज़ाइटी’ से)

इसके उत्तर में गांधीजी ने कहा, ग्रहण और त्याग, जीवन में दोनों की एक जैसी ज़रूरत है, दोनों को लेकर ही मनुष्य के सारे उद्यम हैं-उपनिषद् की अंतिम बात भी निषेधात्मक है, और ब्रह्म की संज्ञा बतलाते हुए उपनिषदों के ऋषि कहते हैं ‘नेति’ । बहुत दिनों से भारत ने ‘ना’ कहने की सामर्थ्य खो दी थी, वही सामर्थ्य उन्होंने भारत को लौटा दी है। ‘बीज बोने के पहले कुदाल चलाना पड़ता है, मिट्टी से गंदगी निकाल देनी पड़ती है ।’

गांधीजी और टैगोर के बारे में टिप्पणी करते हुए नेहरू ने कहा था कि कोई भी दो व्यक्ति इतने अलग नहीं हो सकते जितने गांधीजी और टैगोर । दोनों एक ही विचार और संस्कृति से प्रेरित थे फिर भी आपस में इतने अलग-अलग थे। यह भारतीय संस्कृति की खासियत है जिसने एक ही समय में दो इतने विपरीत विचारधारा वाले और महान लोगों को जन्म दिया। जाने-माने फ्रेंच लेखक रोमेन रोलैंड ने इसे ‘द नोबल डिबेट’ कहा था।


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सत्याग्रह गांधीजी के तरकश में एक प्रभावी तरीका था

गांधीजी  के तरकश में सत्याग्रह का एक और प्रभावी तरीका था, जिसमें आर्थिक बहिष्कार भी शामिल था। इसका अर्थ था विदेशी उत्पादों का बहिष्कार और उनके स्थान पर स्थानीय रूप से उत्पादित वस्तुओं का प्रयोग। गांधीजी के अनुसार, विदेशी वस्त्र बहिष्कार योग्य वस्तुओं में शामिल थे। इसलिए, 1920-22 के दौरान उन्होंने हिंदुस्तान में विदेशी कपड़ों के विनाश का आह्वान किया। जुलाई 1921 में, गांधीजी  ने स्वयं मुंबई में विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का शुभारंभ किया।

गांधीजी का विचार था कि  विश्व की जटिल परिस्थितियों में सामाजिक बहिष्कार की अत्यंत सीमित प्रासंगिकता है। इसे केवल अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में ही अमल में लाना चाहिए, जब कोई उद्धत (विद्रोही) अल्पमत, बहुमत को किसी सिद्धांत के बजाय सिर्फ चुनौती देने के उद्देश्य से खारिज कर दे। सामाजिक बहिष्कार को तभी लागू किया जाना चाहिए जब यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि इसे सजा के रूप में न देखा जाए। ‘यदि इसके द्वारा लक्षित व्यक्तियों को असुविधा होती है, तो उसके दर्द की अनुभूति लक्ष्य साधकों के दिलों में होनी चाहिए।’

सारे देश में जगह-जगह विदेशी कपड़ों की होली जलने लगी और चरखा गूंजने लगा। कुछ ने शुद्ध खादी का व्रत लिया, जिसे लोगों ने अपनी अंतिम सांस तक निभाया।

राजनीतिक क्षेत्रों में, बहिष्कार सविनय अवज्ञा का रूप धारण कर लेता है। इसके अंतर्गत उपाधियों और सम्मानों की वापसी, और जो लोग लोकप्रिय इच्छाओं को अभिव्यक्त नहीं करते, उनसे सभी प्रकार की सेवाओं का इंकार शामिल है। मतदाताओं को तथाकथित प्रतिनिधियों के चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने से पूरी तरह अलग हो जाना चाहिए। असहयोग में शामिल जनता इन प्रतिनिधियों के राजनीतिक जुलूस या जलसों में हिस्सा नहीं लेगी। इस प्रकार, उनके प्रति किसी भी प्रकार का सम्मान व्यक्त नहीं किया जाएगा।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर
Tagore

गांधीजी ने ध्वंस की नैतिकता शीर्षक से लेख लिखा

1921 के अगस्त महीने में जब गांधीजी  के नेतृत्व में बंबई में बहुत से मूल्यवान विदेशी वस्त्रों की होली जल रही थी, रवीन्द्रनाथ के मित्र एंड्रज के आग्रहपूर्ण अनुरोध के उत्तर में गांधीजी  ने ‘ध्वंस की नैतिकता’ शीर्षक एक लेख लिखा था ( 1 सितंबर, 1921), उसमें उन्होंने लिखा था –

जनता के क्रोध का रुख मनुष्यों से हटाकर वस्तुओं की ओर मोड़ रहे हैं।” लेकिन वे यह नहीं समझते कि जनता का क्रोध धीरे-धीरे बढ़ रहा है, और वे सोच रहे हैं, “पहले वस्तुओं को नष्ट कर दें, फिर मनुष्यों पर आक्रमण करेंगे।”

वे उस समय भी यह नहीं समझ पाए कि केवल तीन महीनों के भीतर ही जनता उसी बंबई में नरसंहार पर उतारू हो जाएगी। मनुष्य की जो पाशविक प्रवृत्ति आमतौर पर सोई रहती है,गांधीजी  उससे बहुत अधिक मुक्त हैं; वे अत्यधिक पवित्र और साधु हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि आज जो लोग अधीरता से उनकी बातों को स्वीकार कर रहे हैं, उन्हीं के बीच पाशविक प्रवृत्ति घात लगाए बैठी है।


सरदार पटेल मां की तरह गांधीजी का ख्याल रखते थे


रवीन्द्रनाथ ने किया था अविवेकी या निष्ठुर बर्बादी

रवीन्द्रनाथ अधिक दूरदर्शी थे, उन्होंने इसे असहयोगियों की धृष्टता कहाँ।  टैगोर आंदोलन एवं विरोध प्रदर्शन के विपरीत रचनात्मक कार्यक्रम को विशेष महत्व प्रदान करते थे जिसके कारण उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के विपरीत गांधीजी  को रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने की बात अपने पत्र में कही। असहयोग आंदोलन के दौरान  रवीन्द्रनाथ  टैगोर ने विदेशी वस्त्रों को जलाये जाने को ‘अविवेकी या निष्ठुर बर्बादी’ कहा था।

यद्यपि असहयोगी लोगों ने बड़ी आंतरिकता के साथ अहिंसा की बात कही है, लेकिन साथ ही वे यूरोप के पाप के बारे में जनता को लगातार आगाह भी करते जा रहे हैं और इस तरह वे जनता के मन में भी उस कीटाणु का संचार करते जा रहे हैं, जो किसी-न-किसी दिन हिंसा का आश्रय लेकर रहेगा

 लेकिन जिनका चित्त विद्वेष की सारी भावनाओं से मुक्त है, वे धर्म प्रचारकगण इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं। जो लोगों को कर्मक्षेत्र में उतार रहे हैं, अपने हृदय की धड़कन सुनने से उनका काम न चलेगा, उनहें सिर्फ़ दूसरों के हृदय की ही सुननी पड़ेगी जनता से सावधान रहना चाहिये। जब उन पर नशा चढ़ेगा तो किसी गांधीजी का नैतिक आदेश उन्हें बाँधकर न रख सकेगा।

बेशक, केवल एक संभावना है, जिसके द्वारा जनता बिना सोचे-विचारे नेता की कठोर व्यवस्था को मानने को राजी हो सके अगर नेता अपने को ईश्वर का अवतार घोषित करना स्वीकार कर ले। जनता की छिपी इच्छा भी यही है-लोग तो आज ही गांधीजी को श्रीकृष्ण के रूप में चित्रित कर रहे हैं। लेकिन गांधीजी में जो आंतरिकता और विनय है, उसके कारण ऐसे काम के लिए स्वीकृति देना उनके लिए संभव नहीं है।

अतः जो कुछ बाक़ी रह जाता है, वह है उनका अकेला स्वर, जो एक पवित्रतम मनुष्य का स्वर है और जो गरजते तरजते मानव समुद्र के ऊपर विचरण करता है और कितने दिनों तक वह अपना स्वर सुना पायेगा? कैसी महान कैसी करुण प्रतीक्षा है!

Gandhi-Tagore
Gandhi- Baa- Tagore

 


संदर्भ

Gangeya Mukherji, Gandhi and Tagore, Politics, Truth and Conscience, Taylor & Francis, Publisher

Rudrangshu Mukherjee, Tagore & Gandhi Walking Alone, Walking Together, Aleph Publisher

 

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जब चौरीचौरा के बाद गांधीजी ने रद्द किया असहयोग आंदोलन https://thecrediblehistory.com/2024/02/when-gandhiji-canceled-the-non-cooperation-movement-after-chauri-chaura/ Mon, 12 Feb 2024 05:47:22 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=6784  

जलियावाला बाग़ हत्याकांड ने देशभर में लोगों के मन में अंग्रेजों के प्रति रोष पैदा कर दिया था। 08 मार्च 1919 को रॉलेट एक्ट को काला कानून पास किया गया जिसके तहत ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद कर सकती थी। महात्मा गांधी ने लोगो के इस गुस्से को भांपते हुए 1 अगस्त 1920 से पूरे भारत में असहयोग आंदोलन शुरू किया। महात्मा गांधी के आह्वान पर बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया, वकीलों ने कोर्ट-कचहरी जाना छोड़ दिया, मजदूरों ने फैक्ट्रियों में काम करना बंद कर दिया। लोगों ने विदेशी सामानों बहिष्कार कर दिया ।

 

 

जब गांधीजी ने सविनय अवज्ञा शुरू करने का फैसला लिया

 

29 जनवरी 1922 को बारदोली में हुई एक बड़ी सभा में सविनय अवज्ञा शुरू करने का फैसला लिया गया। सूरत में 31 जनवरी को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में बारदोली के लोगों को आंदोलन शुरू करने के लिए अधिकृत किया गया। बारदोली के लोगों द्वारा सविनय अवज्ञा शुरु करने के फैसले की जानकारी गांधीजी ने वायसराय को पत्र लिखकर दी। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा की मौजूदा स्थितियों में देश को अभिव्यक्ति की आजादी, संगठन बनाने-चलाने की आजादी और मुक्त प्रेस समेत अपनी मांगों की पूर्ति के लिए किसी- न- किसी अहिंसक आंदोलन की जरूरत थी। उन्होंने वायसराय से सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का मांग की।

 

सरकार ने गांधीजी की मांगें नहीं मानीं। वायसराय ने भारतीय लोगों द्वारा दिखाई जा रही गैर-कानूनी गतिविधियों की स्थिति में दमनकारी नीतियों को जायज ठहराया। गांधी बारदोली में अभियान का नेतृत्व करने पहुंचे थे। उन्होंने वही से देश भर में चल रहे दमनकारी कदमों की जानकारी दी। लोगों को उम्मीद थी कि अब गांधीजी देशभर में आंदोलन शुरू करने का आह्वान करेंगे, तभी 8 फरवरी के अखबारों में गोरखपुर जिले के चौरी चौरा में 5 फरवरी को हुई हिंसा की खबरें दी। जब उनकी गोलियां समाप्त हो गई तो वे भागकर थाने में छुप गए। गुस्से से भरी भीड़ ने थाने को घेरकर आग लगा दी और 21 पुलिसवाले जिंदा जल गए। यह सुनकर गांधीजी सदमें में आ गए। उन्होंने 11 फरवरी को कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के सामने अपनी चिंता और शंका रखते हुए आंदोलन को स्थगित करने की अपनी योजना रखी। गरमा-गरम बहस हुई।

 

अनेक सदस्य गांधी से असहमत थे, पर आखिरकार गांधीजी चली और सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। 12 फरवरी से गांधीजी ने पांच दिन का उपवास आत्मशुद्धि के लिए रखा। उनका कहना था कि देश के लोग अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार नहीं हैं। उनका यह गलत फैसला था और उसका प्रायश्चित जरूरी है; पर उन्होंने दूसरों को उपवास नहीं करने दिया। यंग इंडिया के 16 फरवरी के अंक में  उन्होंने अपनी भावनाएं इस तरह व्यक्त की-

 

मेरे ऊपर ईश्वर का बहुत आर्शीवाद रहा है। उसने मुझे तीसरी बार चेताया है कि भारत में अभी भी वह सच्चा और अहिंसक वातावरण नहीं बना है, जिस के सहारे और सिर्फ उसी के सहारे कोई आम आंदोलन, जिसे नागरिक आंदोलन कहा जा सकता है, चलाया जा सकता है। ऐसे आंदोलन को स्वैच्छिक, स्नेहयुक्त, विनम्रता पूर्ण, जानकारी वाला माना जाना चाहिए, आपराधिक और घृणापूर्ण नहीं।

 


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कांग्रेस के अधिकांश नेताओं ने गांधीजी का विरोध किया

 

कांग्रेस के अधिकांश नेता जेलों में बंद थे और उन्हें आंदोलन स्थगित किए जाने की खबर मिली तो वह हैरान रह गए। कई एकदम सीझ गए। मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास, लाला लाजपत राय और कई अन्य नेताओं ने फैसले का विरोध करते हुए पत्र लिखे। मोतीलाल नेहरू ने लिखा-

 

अगर केप कैमरून के पास कोई गांव अहिंसा का पालन नहीं पाया तो हिमालय की तलहटी में बसे शहर को उसकी सजा क्यों? चौरी चौरा और गोरखपुर को छोड़िए, पर सविनय अवज्ञा आंदोलन जारी रखिए।

 

आंदोलन स्थगित करने के फैसले से सरकार का हौसला बढ़ गया। ब्रिटिश गृहमंत्री मांटेग्यू ने बयान दिया- अगर हमारे साम्राज्य के वजूद को चुनौती दी गई तो भारत के प्रति ब्रिटश सरकार की जिम्मेदारियों के निवार्ह में बाधा आई और यह सोचकर मांगे रखी गई, मानो हम भरत से निकलने की सोच  रहे हैं, फिर तो भारत दुनिया के सबसे दृढ़्निश्चयी लोगों को चुनौति देने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि वह लोग फिर अपनी ताकत और निश्चय के साथ इस चुनौती का जवाब देंगे।

 

अंग्रेजों द्वारा दी गई चुनौती के बारे में गांधीजी ने 23 फरवरी 1922 के यंग इंडिया के अंक में लिखा- जब तक ब्रिटिश शेर हमारे चेहरे पर अपने डरावने पंजे घूमता रहेगा, तब तक कैसे कोई समझौता हो सकता है?

 

लार्ड बर्कनहेड और मिस्टर मांटेग्यू, दोनों ही शायद नहीं जानते हैं कि भारत समुद्र के रास्ते आने वाले सारे हार्ड फाइबर के लिए तैयार है। सत्ता के रेड वाइन के नशे और कमजोर नस्लों की लूट वाला कोई साम्राज्य दुनिया में लंबे समय तक नहीं टिका है और अगर ईश्वर है तो दुनिया की कमजोर नस्लों को संगठित ढंग से लूटने वाला और निरंतर क्रूरता पर टिका ब्रिटिश साम्राज्य टिक नहीं सकता।

24 फरवरी को दिल्ली में कांग्रेस कमेटी की बैठक हुई और उसमें गांधीजी को विरोध और आलोचना झेलनी पड़ी। उन्होंने मोतीलाल नेहरू और लाजपत राय की चिठ्ठियां पढ़ी और कहा- जो जेल गए है, वह नागरिक के रूप में उतने समय के लिए अदृश्य ही हैं और वे न तो कोई दावा कर सकते हैं , न ही उनसे बाहरवालों को सलाह देने की उम्मीद कर सकते हैं। बैठक में गांधीजी के हल में फैसला हुआ, पर उन्हें लगता रहा कि बहुमत पूरे मन से उनके साथ नहीं है। इस मौके पर हुई उनकी गिरफ्ताई से सब कुछ बदल दिया।

 

यंग इंडिया में 9 मार्च 1922 के अंक में अगर मैं गिरफ्तार किया गया शीर्षक से गांधी ने लिखा-

अगर सरकार असहयोग आंदोलन की, व्यक्तिगत या सामूहिक, स्थायी रूप से खत्म करना चाहती तो मुझे गिरफ्तार करना कैसे छोड़ सकती है? सरकार द्वारा खून की नदियां बहा देना भी मुझे नहीं डरा स्कता। संक्षेप में कहें तो असहयोग आंदोलन पूरे देश में जोर-शोर और अनुशासन के साथ जारी रहेगा, अगर लोगों ने इस कार्यक्रम के अनुरूप काम किया तो वह जीतेंगे।

 

 


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गांधीजी की गिरफ्तारी और मुकदमा

गांधीजी ने आंदोलन तो स्थगित कर दिया था, लेकिन सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना  और निंदा करना जारी रखा। गांधीजी का विरोध हो रहा था और उनका समर्थन घट गया है, यह मानकर सरकार ने उनके यंग इंडिया के लेख को बहाना बनाकर उन्हें और पत्रिका के प्रकाशक शंकरलाल बैंकर को 10 मार्च 1922 को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें साबरमती जेल ले जाया गया। सेशन जज ने 18 मार्च 1922 को उनके मुकदमे की सुनवाई शुरू की। उन दोनों पर तीन लेखों के जरिए सरकार के प्रति असंतोष फैलाने का आरोप धारा 124ए के तहत लगाया गया। गांधीजी और शंकरलाल बैंकर दोनों ने अपना अपराध कबूल किया।

 

अपने लिखित बयान में गांधीजी ने कहा-

मुझे भारतीय लोगों और इंग्लैंड के लोगों को यह बताना होगा कि साम्राज्य का एक पक्का समर्थक और सहयोगी नागरिक होने के बाद मैं क्यों असहयोगी और पक्का असंतुष्ट बन गया हूं?  रौलेट एक्ट कानून के रूप में हिंदुस्तानी लोगों की सारी वास्तविक आजादी को छीनने वाला था। इसके बाद पंजाब की डरावनी घटना और ब्रिटिश सरकार द्वारा खिलाफत को लेकर दिए गए वचन से मुकरना मुझे असंतुष्ट करती है। पंजाब वाले अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश हुई और अधिकांश अपराधी ने सिर्फ सजा से बच गए, बल्कि सरकारी सेवा में भी बने रहे और कुछ  हिंदुस्तान के पैसे से पेंशन भी दी जाती रही। कई को तो पुरस्कृत किया गया।

 

मैं मानता हूं कि सरकार ने पिछली किसी राज की तुलना में हिंदुस्तान कमजोर हुआ है। इस व्यवस्था से प्रेम करना मैं अपराध मानता हूं और मुझे यह सौभाग्य हासिल है कि मैंने पिछले अनेक लेखों में उसके प्रमाण समेत तर्क दिए हैं।

शंकरलाल बैंकर ने कहा कि उन्हें ये लेख छापने का अभिमान है। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार किया।

 

जज ब्रूमफील्ड ने सजा सुनाते हुए गांधीजी की तारीफ की। उसने कहा-

कानून व्यक्तियों के बीच भेद नहीं करता, फिर भी इस को नजरअंदाज करना असंभव है कि मैंने जितने लोगों के खिलाफ मुकदमें सुने हैं या आगे सुनूंगा, आप उन सबसे अलग हैं। इस तथ्य को भुलाना मुश्किल है कि अपने करोड़ों देशवासियों की नजरों में आप महान देशभक्त है और उनके नेता हो। राजनीति में आपसे असमति रखनेवाले भी मानते हैं कि आपके विचार काफी ऊंचे और अच्छे हैं तथा आपका जीवन संत जैसा है। आपके खिलाफ सजा देते हुए मैं 12 साल पहले मिस्टर बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ इन्हीं धाराओं में चले मुकदमे का अनुसरण कर रहा हूं। मुझे लगता है कि खुद को मिस्टर तिलक के साथ रखे जाना आपको बुरा नहीं लगेगा और आपको धारा तोड़ने पर दो-दो साल अर्थात कुल छल साल की सजा दी जाती है और मैं यह भी कहना चाहता हूं कि हिंदुस्तान की आगे की घटनाओं के क्रम में अगर सरकार आपकी सजा की अवधि कर करे या आपको छोड़ दे तो मुझसे अधिक खुशी किसी और को नहीं होगी।

 

गांधी ने जज के इस शिष्टाचार पर कहा-

मैं सिर्फ एक शब्द कहूंगा। चूंकि आपने मेरे मुकदमे के सिलसिले में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम लिया, सो मैं यहीं कहूंगा कि उनके साथ यह जुड़ाव मेरे लिए सबसे अभिमान करने योग्य और विशेष क्षण था।

 

शंकरलाल बैंकर को एक साल की कैद और हजार रुपए का जुर्माना देने की सजा हुई। जुर्माना न चुकाने पर सजा छह महीने और बढ़नी थी। शंकरलाल बैंकर ने जुर्माना नहीं भरा।

इन खास कैदियों को जल्दी ही यरवदा जेल, पुणे भेज दिया गया। गांधीजी पर जेल के नियम सख्ती से लागू किए गए। उन्हें साल में सिर्फ चार पत्र लिखने की इजाजत मिली। पहले दो पत्र उन्होंने कस्तूरबा गांधी और अजमत खान को लिखे, जिसे बंबई सरकार ने सेंसर कर दिया। उसने पत्र के आपत्तिजनक हिस्से को हटाने को कहा गया। उन्होंने इसको अस्वीकार कर दिया और आगे कोई पत्र नहीं लिखा।

 


संदर्भ

जे.बी. कृपलानी, आंखो देखी आजादी की लड़ाई, अनुवाद अरविंद मोहन, प्रभात प्रकाशन

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