Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Setting::$title is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php on line 13

Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Setting::$description is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php on line 15

Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Setting::$keyID is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php on line 17

Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Setting::$keySecret is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php on line 19

Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Setting::$paymentAction is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php on line 21

Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Setting::$template is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php on line 23

Deprecated: Creation of dynamic property RZP_Payment_Button_Loader::$settings is deprecated in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/razorpay-payment-buttons.php on line 73

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php:13) in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/ip2location-country-blocker/ip2location-country-blocker.php on line 2040

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php:13) in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/ip2location-country-blocker/ip2location-country-blocker.php on line 2041

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php:13) in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/ip2location-country-blocker/ip2location-country-blocker.php on line 2042

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php:13) in /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/ip2location-country-blocker/ip2location-country-blocker.php on line 2043

Warning: Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/theckwwv/public_html/wp-content/plugins/razorpay-payment-button/includes/rzp-btn-settings.php:13) in /home/theckwwv/public_html/wp-includes/feed-rss2.php on line 8
झारखंड – The Credible History https://thecrediblehistory.com People’s history in people’s language Tue, 17 Dec 2024 06:55:20 +0000 en-US hourly 1 https://thecrediblehistory.com/wp-uploads/2023/05/cropped-cropped-LogoTCH-32x32.png झारखंड – The Credible History https://thecrediblehistory.com 32 32 वीर तेलंगा खड़िया जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ी थी जंग https://thecrediblehistory.com/2024/12/veer-telanga-khadiya-who-waged-war-against-the-british/ https://thecrediblehistory.com/2024/12/veer-telanga-khadiya-who-waged-war-against-the-british/#respond Tue, 17 Dec 2024 06:55:20 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=9565 भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में  झारखंड का एक महत्वपूर्ण स्थान है। प्रारंभ में यह क्षेत्र बंगाल राज्य का हिस्सा था। झारखंड की धरती ने कई वीर सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने जनजातीय समुदाय को संगठित कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया। ये वीर अपने प्राणों की परवाह किए बिना देश की स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गए। हालांकि, उनके हृदय में विद्रोह की ज्वाला सदैव प्रज्वलित रही। इन आंदोलनों ने अंततः अंग्रेजी शासन को अपनी नीतियों में बदलाव करने पर मजबूर कर दिया।

स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड के अनेक वीर सपूतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनमें से एक प्रमुख नाम तेलंगा खड़िया का है। अनपढ़ होते हुए भी तेलंगा खड़िया अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उनकी वाणी में जोश और आक्रोश स्पष्ट रूप से झलकता था, जो लोगों को बिना किसी भेदभाव के उनकी ओर खींच लाता था। छोटा नागपुर के विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने जनजातियों को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा किया।

अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था, लेकिन तेलंगा खड़िया ने इसे चुनौती देना अपना कर्तव्य समझा। उन्होंने गांव-गांव जाकर  जूरी पंचायतों का गठन किया और लोगों को संगठित किया। उनके नेतृत्व में जनजाति समुदाय तलवार और तीर-धनुष चलाने का प्रशिक्षण लेने लगा। अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों, जैसे बंदूक और राइफल, का सामना उन्होंने पारंपरिक तीर-धनुष और तलवारों से किया। उनके साहस और उमंग की कोई तुलना नहीं थी।

उनका बलिदान आज भी हमें अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है। झारखंड में उनके कारनामों को लोक गीतों के माध्यम से गाया जाता है, जो उनकी वीरता और संघर्ष की कहानी को जीवंत बनाए रखते हैं।




कौन थे तेलंगा खड़िया

अमर शहीद तेलंगा खड़िया का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निडरता से आवाज उठाई। उनका जन्म 9 फरवरी 1806 को झारखंड के गुमला जिले के सिसई प्रखंड स्थित मुरगु गांव में एक साधारण गरीब किसान परिवार में हुआ। उनका परिवार गांव के जमींदार और पाहन वर्ग से संबंधित था। उनके दादा, सिठ खड़िया, धार्मिक, सरल, और साहित्यिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे।

खड़िया भाषा में साहसी और वाचाल व्यक्तियों को “तेब्बलंगा” कहा जाता है। इसी गुण के कारण उनका नाम तेलंगा खड़िया पड़ गया। खड़िया जनजाति के लोग सरना धर्म पर गहरी आस्था रखते थे, और तेलंगा खड़िया भी अपने समुदाय के इस विश्वास में दृढ़ थे। तेलंगा खड़िया की विशेषता यह थी कि वे एक साधारण किसान होने के बावजूद अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण थे और अपने लोगों को भी इसकी शिक्षा देते थे। वे बहादुरी और नेतृत्व के प्रतीक थे, जिन्होंने अपने समुदाय को संगठित कर अंग्रेजों के आतंक का सामना किया।

झारखंड में अंग्रेजों का आगमन 1767 में हुआ, और 1837 तक उन्होंने इस क्षेत्र पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया। अंग्रेजों की नीतियां मनमानी और शोषणकारी थीं। वे जमींदारों से कर वसूलते, जमींदार रैयतों से, और अंततः इनकी जमीनें बाहरी सूदखोरों या मध्यस्थों के हाथों चली जातीं। इस शोषण का परिणाम विद्रोह के रूप में सामने आया।

विलियम हंटर ने बंगाल की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा:

“वहां की आधी जमीन इस सेल लॉ के कारण सूदखोरों और मध्यस्थों के हाथ चली गई। सभी तबाह थे—राजा, जमींदार, रैयत सब। परिणामस्वरूप, विद्रोह पर विद्रोह होने लगे।”

जनजातीय समुदाय की जिंदगी जल, जंगल, और जमीन के इर्द-गिर्द घूमती थी। वे स्वतंत्र विचारधारा वाले लोग थे और आपसी सहयोग के साथ रहते थे। अंग्रेजी शासन ने उनकी स्वायत्तता और संस्कृति पर प्रहार किया। यहां तक कि उनकी महिलाओं की इज्जत पर भी खतरा मंडराने लगा।

तेलंगा खड़िया ने इस अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर दिया। पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद उनकी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता असाधारण थी। उन्होंने जनजातीय समुदाय के स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए अंग्रेजी शासन के आतंक का डटकर सामना किया।


भूमकाल के आदिवासी विद्रोह का नेता गुण्डाधूर


1880 का खड़िया विद्रोह

1880 का खड़िया विद्रोह
1880 का खड़िया विद्रोह

 

तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में खड़िया विद्रोह 1880 ई. में प्रारंभ हुआ। यह आंदोलन अपनी मिट्टी, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए जनजातीय समुदाय का संगठित प्रयास था। अंग्रेजों के शोषण और उनके अधिकारों के अतिक्रमण को समाप्त करने के लिए तेलंगा खड़िया ने युवा वर्ग को गदका, तीर, और तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया। इस संघर्ष में उनकी पत्नी, रतनी खड़िया, ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया, जो उनके साहस और संकल्प को और मजबूत करता था।

तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजी शासन को सिरे से नकार दिया और इसे अन्याय का प्रतीक माना। आतंक के सामने झुकना उन्होंने अपराध समझा। अपनी प्रखर वाणी और बुलंद वक्तव्यों से उन्होंने जनजातीय समुदाय को न केवल संगठित किया, बल्कि उन्हें विद्रोह के लिए प्रशिक्षित और प्रेरित भी किया।

उन्होंने अपनी एक प्रभावशाली उक्ति के माध्यम से जनजातीय समुदाय के अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने हथियारों की असमानता को मात देने के लिए साहस और एकता को सबसे बड़ा हथियार बनाया।

“जमीन हमारी, जंगल हमारी, मेहनत हमारी, तो फिर जमींदार और अंग्रेज कौन होते हैं हमसे लगान और मालगुजारी वसूलने वाले। अंग्रेजों के पास अगर गोली-बारूद है, तो हमारे पास भी तीर-धनुष, कुल्हाड़ी और फरसे हैं।”




जूरी पंचायतों की स्थापना

तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति को भलीभांति समझ लिया था। उन्होंने यह महसूस किया कि जनजातीय समुदायों में एकता की कमी के कारण अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ रहा था। इस समस्या का समाधान करने के लिए उन्होंने गांव-गांव घूमकर जनजातियों के बीच संपर्क स्थापित करना शुरू किया। छोटानागपुर के पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में उन्होंने प्रत्येक गांव का दौरा किया और सभी वर्गों के बीच धार्मिक और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया।

तेलंगा खड़िया ने जगह-जगह पंचायतों का गठन किया, जो जनजातीय समाज के संगठन और विद्रोह की नींव बने। इन पंचायतों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के बीज बोए। जूरी पंचायत एक ऐसा संगठन था जहां विद्रोहियों को न केवल युद्ध कौशल सिखाया जाता, बल्कि रणनीति बनाने और गोरिल्ला युद्ध की विधियों का भी प्रशिक्षण दिया जाता।

तेलंगा खड़िया ने जूरी पंचायतों को आपस में रणनीतिक तौर पर जोड़ा। इन पंचायतों के बीच अत्यधिक संगठित संवाद और तालमेल था।

जमींदारों के लठैतों और अंग्रेजी सेना की गतिविधियों की सूचना विद्रोहियों को समय से पहले मिल जाती थी, जिससे वे युद्ध के लिए तैयार रहते। प्रत्येक गांव में अखाड़ों की स्थापना की गई, जहां युवा तलवार, गदा और अन्य पारंपरिक हथियारों का अभ्यास करते। तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में विद्रोही सेना जंगलों और घाटियों में छिपकर गोरिल्ला युद्ध करती, जिसमें वे शत्रु को भारी नुकसान पहुंचाते।

तेलंगा खड़िया ने जूरी पंचायतों के माध्यम से छोटे स्तर पर अंग्रेजों की समानांतर सत्ता का विकल्प तैयार किया। इन पंचायतों ने न केवल विद्रोहियों का नेतृत्व किया, बल्कि जनजातीय समाज के लिए एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा भी प्रदान किया। शोध से यह पता चलता है कि तेलंगा खड़िया ने अपने कार्यक्षेत्र में अनेक जूरी पंचायतों का गठन किया, जिनका केंद्र वर्तमान गुमला जिले के भीतर था।

तेलंगा खड़िया का नेतृत्व न केवल विद्रोह की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि यह उनके संगठन कौशल और रणनीतिक सोच को भी प्रदर्शित करता है। उन्होंने जनजातीय समाज को न केवल एकजुट किया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता और संघर्ष के लिए तैयार भी किया।

सरना धर्म

अन्य जनजाति विद्रोहों के समान खड़िया आंदोलन में भी धर्म की प्रधानता थी। वे सरना धर्म के अनुयायी थे । सरना धर्म झारखंड के आदिवासियों का आदि धर्म है।

आदिवासी आदिकाल जंगलों में रहते थे और प्रकृति के सारे गुण और सारे नियमों को समझते थे। उसी समय आदिवासियों में जो पूजा पद्धति व परंपरा विद्यमान थी, वही आज भी अस्तित्व में है । सरना धर्म में पेड़ पौधे पहाड़ इत्यादि प्राकृतिक संपदा की पूजा की जाती है ।

सरना स्थल पर पूजा के पश्चात ही जूरी पंचायत के नेता व सदस्य अखाड़े में प्रवेश कर पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र प्रशिक्षण ग्रहण करते थे। युवाओं को सभी तरह के युद्ध विद्याओं से पारंगत किया जाता था। कहा जाता है कि आस्था में बड़ा बल होता है, तेलंगा ने इसी बल द्वारा लोगों को संगठित कर उनका मनोबल बढ़ाया।

गुरिल्ला युद्ध

खड़िया आंदोलन में आदिवासियों ने गुरिल्ला रणनीति अपनाई । गुरिल्ला युद्ध प्रत्यक्ष रूप से न करके परोक्ष रूप से की जाती है। इस युद्धकी सबसे सफल रणनीति असावधान शत्रु पर प्रहार कर छुप जाने की होती है। यदि दोनों पक्ष बराबर के हो तो क्षति भी बराबर की होती है। और यदि एक पक्ष ज्यादा मजबूत हो तो कमजोर की हानि अधिक होती है, परंतु गोरिल्ला युद्ध के बात कुछ अलग ही होती है।

इसमें दुर्बल पक्ष अपने से कई गुना सफल पक्ष को हानि पहुंचाता है। गुरिल्ला युद्ध से लोग क्यों प्रेरित होते हैं, इस संबंध में क्यूबा के क्रांतिकारी नेता चे ग्वेरा का कहना है-

हमें इतिहास से पता चलता है कि अनेक देशों के क्रांतिकारियों ने गुरिल्ला युद्ध की तकनीक से कई सामर्थ्यवान साम्राज्यो को चुनौती दी, शक्तिशाली सेनाओं को परास्त किया और उन्हें वापस लौटने पर मजबूर किया। भगवान राम की सेना ने रावण की शक्तिशाली सेना को गुरिल्ला युद्ध से लड़कर ही परास्त किया था।


यह वेबसाईट आपके ही सहयोग से चलती है। इतिहास बदलने के खिलाफ़ संघर्ष में

वेबसाइट को SUBSCRIBE करके

भागीदार बनें।


तेलंगा का आंदोलन, गिरफ्तारी और शहादत

तेलंगा खड़िया
तेलंगा खड़िया

तेलंगा ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई की शुरुआत मुरगु गांव से की। अधिकतर गांव के जमींदार अंग्रेजी शासन से पीड़ित थे, इसलिए विद्रोहियों को ग्रामीणों का भरपूर समर्थन मिल रहा था। गुरिल्ला युद्ध में दुश्मनों को पछाड़ने के बाद विद्रोही जंगलों में भूमिगत हो जाते। तेलंगा, जमींदारों एवं अंग्रेजी शासन के लिए खौफ बन चुका था। तेलंगा के संगठनात्मक कार्य के बारे में अंग्रेज सरकार को जब पता चला तो तेलंगा को पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार द्वारा आदेश जारी किया गया। जब तेलंगा को इस बात की जानकारी मिली वह घर से बाहर रह कर ही संगठन का कार्य करने लगे। तेलंगा कभी-कभी घर आया करते थे क्योंकि उन्हें पकड़े जाने का डर था। उनका लक्ष्य अंग्रेजों को झारखंड से बाहर निकालना था।

तेलंगा को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने इनाम की घोषणा की। भारत में तेलंगा जैसे देश भक्त थे, तो कुछ देशद्रोही भी थे जो अंग्रेजों से मिले हुए थे और देशद्रोहियों के मुखबिरी के कारण ही तेलंगा कुम्हारी गांव में बैठक करते समय ही बंदी बना लिए गए। लोहरदगा में मुकदमा चला और तेलंगा को 14 साल की सजा सुनाई गई। उन्हें कोलकाता जेल भेज दिया गया।

14 साल बाद जब तेलंगा जेल से छूटा तो उसके विद्रोही तेवर और भी तल्ख हो गया। विद्रोहियों की दहाड़ से जमींदारों में डर समा गया। जूरी पंचायत फिर से जिंदा हो उठे और युद्ध प्रशिक्षण का दौर शुरू हो गया। बसिया से कोलेबिरा तक विद्रोह की लपट फैल गई। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं हर कोई विद्रोह में भाग ले रहे थे। तेलंगा, जमींदारों व अंग्रेजों के लिए एक भूखा शेर बन गया था।

 दुश्मन के पास एक ही रास्ता था, तेलंगा को मार गिराया जाए। जगह-जगह छुप-छुपकर जनजाति गुरिल्ला युद्ध कर अंग्रेजों से जूझ रहे थे। तेलंगा की पत्नी रतनी खड़िया भी मैदान में उतर आई। उन्होंने कई मोर्चों पर नेतृत्व संभाला। महिलाओं ने जम कर इस विद्रोह में भाग लिया और अंतिम साँस तक लड़ी।

तेलंगा मरा नहीं, मार दिया गयाऔर मर कर भी भारत का यह सपूत अमर हो गया। आगे से किसी को इस पर गोली चलाने की हिम्मत नहीं थी। अपने ही समुदाय केअंग्रेजों के एक सिपाही बोधन सिंह ने इसकी पीठ पर गोली दागी। तेलंगा गिर पड़ा, वह दिन 23 अप्रैल, 1880 था। वह सिसई मैदान में प्रशिक्षण देने के पूर्व सरना स्थल पर पूजा कर रहा था। वह दिव्य पुरुष और महान आत्माथा सफेद झंडे के नीचे, घुटने टेक, नमन कर, उसने सरना माता, सूर्य भगवान एवं अपने पूर्वजों का नाम लेकर आराधना की। परंतु इसी समय गोली लग जाने से वह गिर पड़ा। दुश्मन तेलंगा के शरीर पर अधिकार नहीं कर पाए। बेहोश तेलंगा के पास उन लोगों को आने की हिम्मत नहीं हुई। तेलंगा के अनुयायी उसके शरीर को लेकर जंगल में गायब हो गए। तेलंगा फिर कभी नजर नहीं आया। उनके शहीद स्थान को


संदर्भ

रंजना चितले, जनजातीय योद्धा, स्वाभिमान और स्वाधीनता का संघर्ष, प्रभात प्रकाशन

संजय कृष्ण, झारखंड के क्रांतिकारी, प्रभात प्रकाशन,

Anindita, Telanga Khadiya Ki Amar Kahani, Rajkamal Prakashan

]]>
https://thecrediblehistory.com/2024/12/veer-telanga-khadiya-who-waged-war-against-the-british/feed/ 0
जतरा भगत : आजादी के गांधीवादी योद्धा https://thecrediblehistory.com/2024/11/jatra-bhagat-gandhian-warrior-of-freedom/ https://thecrediblehistory.com/2024/11/jatra-bhagat-gandhian-warrior-of-freedom/#respond Wed, 06 Nov 2024 10:42:07 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=9078 भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के समान, इस देश के स्वतंत्रता संग्राम के भी विविध स्वरूप रहे हैं। भारत के वनीय क्षेत्रों में अनेक जनजातीय समुदाय दुर्गम स्थलों, वनों एवं शैलीय पर्वतों में निवास करते रहे हैं, और वर्तमान में भी निवास करते हैं।

भारत की स्वतंत्रता की आकांक्षा इन सभी समुदायों के हृदय में भी प्रबल रूप से विद्यमान थी। इन समुदायों ने ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हुए भी स्वतंत्रता के लिए जागरूकता उत्पन्न की, संघर्ष किया और बलिदान दिए।

कौन थे जतरा भगत

जतरा भगत एक जनजातीय समूह के व्यक्ति का नाम है।  उनका जन्म ओराँव जनजातीय समुदाय में हुआ था। वह  झारखंड के गुमला जिले के एक लघु ग्रामीण क्षेत्र ‘नवाटोली’ में जन्मे थे। 1888 में जन्मे  जतरा भगत  का जीवन वृत्तांत अद्वितीय है। लगभग 25 वर्ष की आयु में जतरा भगत का व्यक्तित्व विशिष्ट था।

जतरा भगत की वाणी में प्रभावशाली गुण था। अहिंसा उनके लिए सर्वोच्च नैतिक मूल्य बन गई थी, उनके उपदेशों में प्राकृतिक पर्यावरण का महत्त्व और संरक्षण केंद्रीय विषय बन चुके थे।वह नियमित रूप से अपने पूर्वज क्रांतिकारी बिरसा मुंडा का उल्लेख करते थे। इस प्रकार सदाचार, अहिंसा के समर्थन तथा अंधविश्वास और कुप्रथाओं का विरोध करते-करते जतरा भगत की स्वतंत्रता की चेतना भी अब विकसित होने लगी थी। उराँव जनजाति के लोग अब उन्हें ‘जतरा बाबा’ या ‘टाना बाबा‘ के सम्मानजनक शब्दों से संबोधित करने लगे थे।

जतरा भगत ने अपने समुदाय में आजादी की अलख जगाया

उन्होंने अपने समुदाय के मध्य स्वतंत्रता की अभिलाषा उत्पन्न की। टाना भगत का यह सामाजिक एवं राष्ट्रीय आंदोलन टाना भक्तों के आंदोलन के नाम से प्रचलित हुआ। इस आंदोलन का उद्भव उन उत्पीड़नों से हुआ, जो तत्कालीन भारत के प्रत्येक ग्रामीण क्षेत्र की वास्तविकता बन चुके थे— व्यापारियों, जागीरदारों एवं ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए अत्याचार।

जतरा बाबा के आंदोलन ने सर्वप्रथम उन व्यापारियों के विरुद्ध विरोध प्रदर्शित किया, जो उनकी भूमि पर अधिकार जमा रहे थे एवं उन्हें ऋणग्रस्त बनाकर दयनीय परिस्थितियों में धकेल रहे थे। व्यापारियों के प्रति  टाना आंदोलन की विरोधी गतिविधियों का अवलोकन कर अंग्रेज अधिकारियों ने सतर्कता अपनाई। उन्हें आशंका हुई कि यह विद्रोह जागीरदारों एवं तत्पश्चात शासन तक विस्तारित हो सकता है।

आंदोलन को दमित करने के प्रयास आरंभ हुए। टाना आंदोलन के समर्थकों को गिरफ्तार किया गया। उन्हें यातनाएँ दी गईं एवं अंततः शांति भंग करने तथा जनसमूह को उकसाने के आरोप में जतरा भगत को 1914 में बंदी बना लिया गया। एक वर्ष के कारावास के पश्चात उन्हें इस शर्त पर मुक्त किया गया कि वे न तो कोई सामाजिक कार्य करेंगे और न ही टाना आंदोलन के नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करेंगे।

जतरा भगत जेल से मुक्त हुए। उन्होंने शांतिपूर्वक निर्धारित शर्तों का अनुपालन किया। उन्होंने आंदोलन का परित्याग किया, उपदेश देना समाप्त कर दिया तथा अत्याचारियों के कृत्यों का अवलोकन करते रहे। वह कृषक से श्रमिक में परिवर्तित हो गए और अत्यंत साधारण जीवन व्यतीत करते रहे।


वायकोम सत्याग्रह सामाजिक सुधार का संघर्ष


गांधीजी में जतरा भगत की छवि लोगों ने देखी

महात्मा गांधी और टाना आंदोलन
महात्मा गांधी और टाना आंदोलन

जतरा भगत के उपदेशों के प्रमुख तत्व थे—अहिंसा, सदाचरण, जीवप्रेम, कुरीतियों से मुक्त समाज और स्वतंत्रता की चेतना। ये तत्व उराँव स्त्री-पुरुषों के दिलों में बस चुके थे। इसलिए, जब 1921-22 में महात्मा गांधी के उपदेशों की गूँज उनके कानों में पड़ी, तो उन्हें गांधीजी में जतरा भगत की छवि दिखाई देने लगी।

बड़ी संख्या में टाना भगत कांग्रेस में शामिल हो गए। आंदोलन का अहिंसात्मक स्वरूप प्रबल हुआ और अब इसका नेतृत्व सिदो भगत कर रहे थे। यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक था, और उराँव समाज गांधीजी के पीछे चल पड़ा। उन्होंने खादी धारण कर ली और जीवन को सरल व हिंसामुक्त बना लिया। अब, टाना भगत के आदर्शों के अनुसार, इस आंदोलन को सच्चा स्वरूप मिल गया।

1925 में चाईबासा (राँची) में गांधीजी  से  टाना भगतों की भेंट हुई थी।  गांधीजी  इस आंदोलन और  जतरा भगत  के कार्यों से बेहद प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि उराँव भाई-बहन बच्चों की तरह सरल और दृढ़निश्चयी हैं। भगतों के हाथों में खादी और चरखा देखकर मुझे अत्यंत खुशी हुई है। उन्होंने शाकाहार को भी अपना लिया है, जो अत्यंत प्रशंसनीय है।

‘भारत छोड़ो आंदोलन‘ (1942) में भी टाना भगतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जतरा भगत की स्वतंत्रता चेतना उनके समय तक सीमित नहीं रही। टाना आंदोलन आजादी की लड़ाई में एक परंपरा बन गया, जिसमें उराँव जनजाति के पुनर्जागरण के विभिन्न पक्ष उद्घाटित होते रहे। यह आंदोलन 1914 से स्वतंत्रता प्राप्ति तक जारी रहा।

लीठो नायक नामक एक उराँव युवती

क्रांतिकारी विचारधारा कभी पूर्णतः समाप्त नहीं होती। यह अत्याचारों के प्रभाव से अवश्य दमित हो जाती है, परंतु स्वतंत्रता की चेतना की प्रबल शक्ति उसे शीघ्र ही पुनर्जीवित कर देती है। यह क्रांतिकारी भावना पुनः उद्भूत हुई, जब जतरा भगत का देहावसान हो गया।

लीठो नायक नामक एक उराँव युवती ने इस आंदोलन को पुनरुत्थान प्रदान किया। लीठो पर जतरा भगत का गहन प्रभाव था। उनकी मृत्यु के उपरांत वह असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करने लगी, ऐसा प्रतीत होता था कि जतरा भगत की आत्मा लीठो के शरीर में प्रविष्ट हो गई हो।

वह गृह-गृह जाकर उपदेश प्रदान करने लगी। मांसाहार और मद्यपान का विरोध करने लगी। मद्यनिषेध के लिए उसने जनजातीय महिलाओं का समूह संगठित किया और उन्हें मद्यनिषेध हेतु प्रेरित किया। लीठो की इन गतिविधियों को देखकर उराँव जनजातीय समुदाय में उसका सम्मान वृद्धिगत हुआ। उन्हें प्रतीत होने लगा कि जतरा भगत का ही लीठो के रूप में पुनर्जन्म हुआ है।

तत्पश्चात्, टाना आंदोलन पुनः सक्रिय हो गया। लोग इससे संबद्ध होने लगे। जतरा बाबा का आशीर्वाद इन सभी को प्राप्त होने लगा। भगतों की संख्या अप्रत्याशित रूप से वृद्धिगत हुई। शोषकों का दमनचक्र और अधिक तीव्र हो गया। लीठो को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

कोई भी आंदोलन जो सत्य, अहिंसा और जनहित के मुद्दों पर आधारित हो, उसे जड़ से उखाड़ फेंकना आसान नहीं होता। यही हाल जतरा भगत के आंदोलन का भी था। इसकी जड़ें बहुत गहरी थीं। समाज-सुधार, सदाचरण और अन्याय के प्रति विद्रोह इसके प्रमुख मूल्य थे। ये मूल्य जन-जन के हृदय में बस चुके थे, इसलिए किसी भी सत्ता के लिए इसे समाप्त कर पाना असंभव था।

भीखू भगत और लीठो नायक की कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं है इसलिए प्रतिकात्मक तस्वीरे ली गई है
भीखू भगत और लीठो नायक की कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं है इसलिए प्रतिकात्मक तस्वीरे ली गई है

भीखू भगत ने टाना आंदोलन को अलख को जलाए रखा

टाना आंदोलन की यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रही। जतरा बाबा के बताए रास्ते पर चलकर उराँव समुदाय का पुनर्जागरण एक बार फिर से हुआ। इस बार इस जागरण के मुखिया थे भीखू भगत, जिन्होंने जतरा भगत की शिक्षाओं को और भी व्यापक स्वरूप देकर आंदोलन को मजबूत आधार दिया।

भीखू भगत जतरा भगत के सच्चे अनुयायी सिद्ध हुए। उन्होंने मांसाहार और शराब को उराँव समाज में वर्जित कर दिया, रीति-रिवाजों का कड़ाई से पालन करवाया, और स्वच्छता अभियानों को आगे बढ़ाया। स्नान, पूजा और सांस्कृतिक त्योहारों की सुंदर परंपरा स्थापित कर, भीखू भगत ने उराँव जनजाति को एक स्वच्छ और पवित्र परिवेश प्रदान किया।

हालाँकि, कई युवा उराँव इस वैष्णवी सामाजिक आंदोलन से असंतुष्ट थे। उन्हें लगा कि इससे उनकी सामाजिक और आध्यात्मिक उन्नति तो हो सकती है, लेकिन उनकी आर्थिक प्रगति और शोषण से मुक्ति कैसे मिलेगी? इस प्रकार की सोच रखने वाले युवकों ने 1918 में एक अलग दल का गठन किया, जो सशक्त क्रांति का समर्थक था। इस विद्रोह के दौरान लोगों के बीच साल वृक्ष की डालें बाँटी जाती थीं। अंग्रेजों की तोप और बंदूकों से लैस सेना के सामने यह सशस्त्र विद्रोह लंबे समय तक नहीं टिक सका। कई जनजातीय लोग मारे गए और कई को फाँसी दी गई।

संदर्भ

श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, आजादी के अरण्य सेनानी, प्रभात प्रकाशन

रंजना चितले, जनजातीय योद्धा, स्वाभिमान और स्वाधीनता का संघर्ष, प्रभात प्रकाशन

]]>
https://thecrediblehistory.com/2024/11/jatra-bhagat-gandhian-warrior-of-freedom/feed/ 0