पंडित नेहरू महात्मा गांधी की ओर क्यों आकर्षित हुए? इसका मुख्य कारण गांधीजी का विद्रोही स्वरूप था। गांधीजी अन्याय और क्रूरता के विरुद्ध थे और ऊँचे सिद्धांतों में विश्वास करने के बजाय, उन्हें जीवन में अपनाने पर जोर देते थे। पंडित नेहरू और गांधीजी दोनों स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं मानते थे; वे इसे जनता की सामाजिक और आर्थिक उन्नति के साथ जोड़कर देखते थे। पंडित नेहरू के अनुसार, राजनीतिक दासता से मुक्ति के साथ-साथ मानसिक दासता से मुक्ति भी आवश्यक थी।
स्वतंत्रता की इस विचारधारा ने पंडित नेहरू को उस समय गहराई से प्रभावित किया जब 1920 की गर्मियों में उन्होंने पहली बार भारत के गरीब और भूखे किसान को करीब से देखा। इलाहाबाद में जब कुछ किसान पहुंचे, तो पंडित नेहरू ने उनके शिविर का दौरा किया। वहाँ की परिस्थितियाँ देखकर वे भीतर तक हिल गए। इसके बाद, पंडित नेहरू ने भारत को दलित और गरीब किसानों के रूप में देखना शुरू किया। गांधीजी के साथ इस दृष्टिकोण पर चर्चा के दौरान उनके बीच मतभेद भी उभरे। गांधीजी ने धार्मिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया, जबकि पंडित नेहरू को उनके कुछ विचार मध्ययुगीन और अव्यावहारिक लगे।
पंडित नेहरू और गांधीजी के विचारों में वर्षों तक अद्भुत साम्य रहा। हालाँकि समय-समय पर पंडित नेहरू ने अपने कार्य को गांधीजी की नीतियों के अनुरूप ढाला, लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। 1927 से 1947 तक पंडित नेहरू ने उन्हीं विचारों का प्रचार-प्रसार किया जिन्हें वे कार्यरूप में लाना चाहते थे। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका मानना था कि केवल राष्ट्रवाद पर्याप्त नहीं है; भारत को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की व्यापक परिप्रेक्ष्य में अपनी स्थिति का आकलन करना चाहिए।
पंडित नेहरू की खासियत यह थी कि उन्होंने गांधीजी के विचारों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर मध्यवर्गीय बौद्धिक वर्ग को गांधीजी के ध्वज तले संगठित किया। हालाँकि, वे मशीनों और आधुनिक सभ्यता पर गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं थे। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन के धार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर गांधीजी के जोर से भी प्रसन्न नहीं थे। गरीबी और कष्टपूर्ण जीवन के महात्मा गांधी के आदर्शीकरण पर भी उन्हें आपत्ति थी।

1920 के दशक के अंत तक पंडित नेहरू का समाजवाद अधिक ठोस रूप ले चुका था। मार्च 1926 में वे अपनी पत्नी कमला और नौ वर्षीय पुत्री इंदिरा के साथ यूरोप गए, जहाँ उन्होंने 21 महीने बिताए।
इस यात्रा ने उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ लाया और भारतीय राष्ट्रवाद में अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण जोड़ा। उनका मानना था कि भारत को अलग-थलग नहीं देखा जा सकता; वह विश्व समाज का एक अभिन्न अंग है। स्वतंत्रता के बाद, यही दृष्टिकोण उनकी विदेश नीति का आधार बना।
यूरोप यात्रा ने पंडित नेहरू की इस सोच को मजबूत किया कि भारत का स्वतंत्रता संघर्ष अंतरराष्ट्रीय महत्व रखता है। बाद में, भारत की स्वतंत्रता ने एशिया और विश्व में स्वतंत्रता का प्रतीक बना दिया। पंडित नेहरू का विश्वास था कि भारत की प्रगति को विश्व प्रगति से जोड़ा जाना चाहिए। उनकी विदेश नीति में उपनिवेशवाद का विरोध और गुटनिरपेक्षता की भावना इसी सोच का परिणाम थी।
पंडित नेहरू की विचारधारा के परिपक्व होने में 1926 और 1938 की यूरोप यात्राओं का विशेष महत्व रहा। पहली यात्रा के दौरान वे सिद्धांतवादी समाजवादी थे, जो स्वतंत्रता को तभी सार्थक मानते थे जब सामाजिक और आर्थिक उन्नति हो। हालांकि, उस समय उनके पास भारत के आर्थिक पुनरुत्थान के लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं थी। 1930 के दशक में जेल में बिताए गए समय ने उन्हें समाजवादी और मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन करने का अवसर दिया, जिससे स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के बारे में उनके विचार विकसित हुए।
1938 में यूरोप यात्रा के दौरान उनके विचार पहले से अधिक स्पष्ट और परिपक्व हो चुके थे। इस समय उनके अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में उपनिवेशवाद का विरोध तो था, परंतु गुटनिरपेक्षता का पुट इसमें नहीं था।
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1931 में कराची में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पंडित नेहरू ने एक नीतिगत प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रमुख उद्योगों और सेवाओं के राष्ट्रीयकरण की वकालत की गई थी।
इसके पहले 1929 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने एक ठोस समाजवादी कार्यक्रम अपनाने की सिफारिश की थी। पंडित नेहरू ने एक ऐसे समाजवादी भारत का सपना देखा जो सामंती तत्वों और राजशाही के अत्याचारों से मुक्त हो। इस दृष्टिकोण की औपचारिक रूपरेखा 20 साल बाद कांग्रेस के अधिवेशन में प्रस्तुत की गई।
पंडित नेहरू सिद्धांत एक ऐसी नीति और विचारधारा थी जो उपनिवेशवाद से मुक्त हुए नए देशों के लिए बनाई गई थी। भारत ने एक ऐसा मंच प्रदान किया जिससे पश्चिम अपनी साम्राज्यवादी दृष्टि का समायोजन कर सकता था। पंडित नेहरू सिद्धांत ने प्रभुसत्तात्मक समता की संकल्पना को कानूनी दर्जा प्रदान किया, जिसे नवस्वाधीन देशों पर लागू किया गया। इसके मुख्य घटक गुटनिरपेक्षता और पंचशील के पांच सिद्धांत थे। पंडित नेहरू ने भारतीय जनमानस में एक नई मानसिकता को जन्म दिया और देश के मानसिक एवं सामाजिक वातावरण को बदला। उन्होंने लोगों को लोकतंत्र का आदर करना सिखाया और उनका दुरुपयोग नहीं किया।
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यदि पंडित नेहरू न होते, तो भारत का रूप कुछ और होता। पंडित नेहरू ने भारत को एक नया दृष्टिकोण और उद्देश्य दिया और जनता को अपने सपनों का भारत बनाने के लिए प्रेरित किया। अन्य महापुरुषों की तरह पंडित नेहरू में भी मानवीय कमियाँ थीं, लेकिन उनके पास सुधार की शक्ति थी, और उनकी गलतियों को आवश्यकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।
पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत ने स्वतंत्रता का एक नया रूप देखा, जिसने लगभग एक हजार वर्षों बाद आधुनिक दुनिया में स्वाधीनता का अनुभव किया। उनकी लोकप्रियता का राज उनका स्वच्छ हृदय और निःस्वार्थ दृष्टिकोण था।
पंडित नेहरू एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे, जिन्होंने पूर्व और पश्चिम के विचारों का संगम प्रस्तुत किया। विश्व उनके योगदान को चिरकाल तक स्मरण करेगा, क्योंकि उन्होंने भारत के हितों को सदैव प्राथमिकता दी और अपने असफलताओं के बावजूद देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी।
एक अछूत परिवार ने साबरमती आश्रम में स्थायी रूप से रहने की इच्छा प्रकट की । गांधीजी ने उन्हें आश्रम में दाखिल कर लिया। इस पर तूफान उठ खड़ा हुआ। आश्रम की स्त्रियों ने अछूत स्त्री को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया | कस्तूरबा को तो इस विचार से ही घृणा हुई कि दानी बहन रसोई में भोजन बनाए और बरतन साफ करे। गांधीजी ने समझा-बुझाकर उन्हें राजी कर लिया।

कुछ ही समय बाद गांधीजी ने घोषणा की कि उन्होंने अछूत कन्या लक्ष्मी को अपनी पुत्री बना लिया है। इस प्रकार कस्तूरबा एक अछूत की माता बन गईं !
गांधीजी ने जोर दिया कि अस्पृश्यता प्रारंभिक हिन्दू धर्म का अंग नहीं है । वस्तुत: अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका संघर्ष हिन्दू धर्म के नाम पर ही हुआ। उन्होंने लिखा है- “मैं फिर से जन्म नहीं लेना चाहता, लेकिन यदि लेना ही पड़े, तो मैं अस्पृश्य के रूप में पैदा होना चाहूँगा, जिससे मैं उनकी वेदनाओं, कष्टों और उनके साथ किए जानेवाले दुर्व्यवहारों में साझीदार हो सकूँ और जिससे मैं अपने को और उनको दुःखदायी स्थिति से मुक्त कर सकूँ।”
लेकिन अगले जन्म में अछूत पैदा होने से पहले इस जन्म में ही वह अस्पृश्य की भाँति रहने लगे। वह आश्रम के पाखाने साफ करने लगे। उनके संगी-साथी भी साथ हो गए। अब अछूत कोई न रहा, क्योंकि बिना छूत-छात के विचार के हर कोई अछूत का काम करता था। नीच जाति के लोग अछूत कहलाते थे। गांधीजी ने उनके मनोविज्ञान को समझा और अपने को ‘हरिजन’ कहना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने अपने साप्ताहिक पत्र का नाम ‘हरिजन’ रखा धीरे-धीरे ‘हरिजन’ शब्द प्रयोग में आकर गौरवशाली बन गया।
धर्मांध हिन्दुओं ने अछूतों को प्रेम करने के लिए गांधीजी को कभी क्षमा नहीं किया। अपने जीवन में गांधीजी को जिन राजनैतिक बाधाओं का सामना करना पड़ा, उनमें से बहुतों के लिए धर्मांध हिन्दू जिम्मेदार थे। लेकिन बहुसंख्यक लोगों के लिए वह महात्मा थे। वह उनसे आशीर्वाद माँगते थे, खुशी-खुशी उनके पैर छूते थे। इसलिए उन्हें इस बात को दरगुज़र करना पड़ा और वह भूल गए कि वह अछूतों की भाँती कलुषित हैं, क्योंकि वह सफाई का काम करते हैं और अछूतों के साथ रहते हैं और उनके पास एक अछूत लड़की रहती है।
बरसों तक लाखों सवर्ण हिन्दू गांधीजी के आश्रम में उनसे मिलने, उनके साथ खाना खाने और टहलने आते रहे। उनमें से कुछ ने अपने को बाद में शुद्ध किया; लेकिन अधिकांश लोग इतने कायर नहीं थे | अस्पृश्यता का थोड़ा-बहुत अभिशाप दूर हो गया | गांधी- विचारधारा के लोग अछूतों को अपने घरों में रखने लगे। गांधीजी ने अपने उदाहरण से शिक्षा दी।
इतिहास के पन्नों में भुला दिए गए स्वतंत्रता सेनानी मगफूर ऐजाज़ी
शहरी जीवन और औद्योगीकरण के कारण हरिजनों के प्रति अत्याचारों में कमी आई | देहात में लोग एक-दूसरे को जानते हैं; लेकिन अछूत कुछ और तरह का तो लगता नहीं है। रेल-मोटर में सवर्ण हिन्दू उनके साथ सटकर बैठते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता | इस प्रकार के अनिवार्य संपर्क से भी हिन्दुओं को हरिजनों के साथ मिलने-जुलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
फिर भी हरिजनों की गरीबी बनी रही और उनकी ओर से किए गए गांधीजी के प्रारंभिक कार्यों, संकेतों और वक्तव्यों से छुआछूत दूर नहीं हुई । इसलिए गांधीजी को अपना प्रयत्न निरंतर जारी रखना पड़ा। गांधीजी के ऊपर ही यह भार क्यों आकर पड़ा कि वह हरिजनोद्धार का आंदोलन चलाएँ ? और कोई क्यों नहीं ?

1914 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतिम चरण के नायक थे। इसके अलावा गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका का 21 वर्ष का संघर्ष एक बुराई को दूर करने के लिए था, जिसकी जड़ में, आर्थिक प्रश्नों के साथ-साथ रंग-भेद भी था। असमान दैवी देनों के साथ सब मनुष्यों का जन्म होता है, पर उनके अधिकार समान होते हैं।
समाज का कर्तव्य है कि वह उन्हें अपनी योग्यता के विकास तथा स्वतंत्र रहने के लिए समान, अथवा कम-से-कम, खुले अवसर प्रदान करे । तब गांधीजी, जो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समानता के लिए लड़कर ताजे लौटे थे, अपने देश में ही देशवासियों द्वारा देशवासियों पर थोपी हुई क्रूर असमानता को कैसे सहन कर सकते थे ? जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने धर्म, विश्वास अथवा अपने पूर्वजों या संबंधियों के कार्य, नाक की शक्ल, खाल के रंग, नाम-बोध अथवा अपने जन्म-स्थान के कारण, समान अधिकारों से वंचित किया जाता है, वहाँ आजादी की नींव खोखली हो जाती है।
भारत के लिए गांधीजी की आजादी की कल्पना में हिन्दू-अनैतिकता तथा ब्रिटिश शासकों के लिए कोई स्थान न था। उन्होंने 25 मई 1921 के यंग इंडिया में लिखा-“यदि हम भारत के पाँचवें अंग को सतत् गुलामी में रखते हैं, तो स्वराज्य अर्थहीन है। यदि हम स्वयं अमानवीय रहेंगे, तो भगवान् के दरबार में हम दूसरों की अमानवीयता से छुटकारे के लिए कैसे याचना कर सकते हैं ?”
अछूतों के प्रति गांधीजी का रुख साफ था और वह यह कि अस्पृश्यता को वह सहन नहीं कर सकते थे। सच तो यह है कि मनुष्यों के इस अमानवीय बहिष्कार से वह इतने व्यथित थे कि उन्होंने कहा-
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“यदि मेरे सामने यह सिद्ध हो जाय कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म आवश्यक अंग है, तो मैं अपने को ऐसे धर्म के प्रति विद्रोही घोषित कर दूँगा ।” लोकप्रियता का इच्छुक कोई भी व्यक्ति ऐसा सार्वजनिक वक्तव्य नहीं दे सकता था, विशेषकर ऐसे देश में, जहाँ रूढ़िवादी हिन्दुओं का बहुमत था। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा उन्होंने हिन्दू की हैसियत से अपने धर्म को परिष्कृत करने के लिए किया। उनकी दृष्टि में अस्पृश्यता में एक बड़ी व्याधि थी।
धर्मभीरु हिन्दू हरिजनों को अलग रहते देखकर संतुष्ट थे। फिर भी पृथकता में ऐक्य साधने का भारतीय आदर्श तो था ही और उन्हें जोड़नेवाली तीन बातें हैं: संस्कृति की अखंड रेखा, जो धुंधले अतीत से आज दिन तक चली आती है, इतिहास की श्रृंखला, और रक्त तथा धर्म के बंधन, रक्त हिन्दुओं को मुसलमानों और सिखों से जोड़ता है। धर्म इस संबंध को कमजोर करता है, भूगोल जोड़ता है, यातायात के भद्दे साधन विभाजन कर देते हैं, भाषाओं की विविधता भी उन्हें अलग करती है। इन सब तत्त्वों के बीच से गांधीजी और उनकी पीढ़ी को एक राष्ट्र का निर्माण करना था।
लुई फिरर, गांधी की कहानी, अनु. चंद्रगुप्त वार्ष्णेय, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेल में बंद सुभाष चंद्र बोस की तबीयत फरवरी, 1932 में ख़राब होने लगी थी। इसके बाद ब्रिटिश सरकार इलाज के लिए उन्हें यूरोप भेजने को तैयार हो गई। वह इलाज कराने ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना पहुंचे। लेकिन, उन्होंने तय किया कि वह यूरोप में रहने वाले भारतीय छात्रों को आज़ादी की लड़ाई के लिए एकजुट करेंगे। इसी दौरान, उन्हें एक यूरोपीय प्रकाशक ने ‘द इंडियन स्ट्रगल‘ किताब लिखने का काम सौंपा। इस किताब के सिलसिले में ही जून 1934 में वह पहली बार, एमिली शेंकल से मिले थे। सभार : “एक सच्ची प्रेम कथा, एमिली और सुभाष : कृष्णा बोस पुस्तक को…

सुभाष बाबू ने कभी अपनी शादी के बारे में खुलकर बात नहीं की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके भतीजे की पत्नी कृष्णा बोस की लिखी किताब, ‘एमिली और सुभाष‘ से उनके प्रेम-पत्रों की जानकारी मिलती है।
एक सच्ची प्रेम कथा, एमिली और सुभाष पुस्तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस व उनकी पत्नी एमिली शेंकल के संबंधों का दुर्लभतम दस्तावेज है। जिसे शरतचंद्र बोस के पुत्रवधू व शिशिर कुमार बोस की पत्नी कृष्णा बोस के द्वारा लिखा गया है। कृष्णा बोस, शिक्षिका, लेखिका और राजनीतिज्ञ हैं। नेताजी के जीवन और संघर्षों के विषय में प्रतिष्ठित विशेषज्ञ हैं। उल्लेखनीय है कि जनवरी 1941 में 20 वर्षीय शिशिर (कृष्णा बोस के पति) ने ही नेताजी (अपने चाचाजी) को चुपचाप भारत से बाहर निकल जाने में मदद किये थे और पलायन के पहले चरण में उन्हें कार से कलकत्ता से बिहार में गोमो तक सुरक्षित पहुंचाये थे।
सुभाष बाबू व ऐमिली शेंकल की मुलाक़ात जून 1934 में विएना में हुई। दिसम्बर 1937 में दोनों विवाह संबंध में बंध गए, जिसे गुप्त रखा गया। 29 नवम्बर 1942 को जन्मी उनकी 2 माह बेटी अनिता (बोस) को दुर्भाग्यपूर्ण रूप फिर कभी दोबारा नेताजी देख नहीं पाए। एक बार फिर देश की खातिर 1943 में सुभाष, दक्षिण पूर्व एशिया के लिए रवाना हो गए। लेकिन… इस बार वह ऐसे गए कि कभी लौटे ही नहीं। इस बीच 1934 के बाद साथ न रह पाने के दौरान गोपनीय पत्रों के माध्यम से दोनों के बीच संवाद होता रहा। परन्तु फिर भी गोपनीयता की दृष्टि से वे दोनों अपनी भावनाओं को खुलकर पत्र में व्यक्त करने से बचते रहे।
मध्यवर्गीय ऑस्ट्रियाई परिवार में जन्मी एमिली शेंकल ने आजीवन नेताजी की स्मृतियों को संजो कर रहते हुए भारत के प्रति गहरा लगाव लगाये रखा। उन्होंने अपनी बेटी का पालन पोषण अपने दम पर किया।
एमिली शेंकल नेताजी के (शरत बोस के पुत्र) भतीजे शिशिर कुमार बोस के काफी करीबी रहीं। सन 1955 में शिशिर के बाद उनकी पत्नी कृष्णा बोस (इस पुस्तक की लेखिका) से भी एमिली जी की काफी नजदीकी संबंध रहे।
https://thecrediblehistory.com/featured/how-was-the-relationship-between-mahatma-gandhi-and-subhash-chandra-bose/
यह पुस्तक, निजता पसन्द करने वाली ऐमिली शेंकल के साहसी व आत्मनिर्भर जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज होने के साथ ही ऐमिली शेंकल व सुभाष बाबू की प्रेम कथा भी है।
इस पुस्तक से कुछ महत्वपूर्ण बातें इसपर है:-
लेखिका लिखतीं हैं, ..सन 1951 की सर्दियों में अपनी विएना यात्रा के दौरान ही हमने (कृष्णा बोस) आंटी (एमिली शेंकल) को इस बात के लिए राजी किया था कि अगले साल वह अनिता को हमारे पास भारत आने दें। .. ‘अनिता’ (17 वर्ष) भी काफी समय से भारत आने पर उत्सुक थी। लेकिन आंटी (एमिली शेंकल) के मन में हिचक थी। उनका कहना था कि “अनिता को इस बात की समझ नहीं है कि उसके पिता के प्रति भारतीयों के मन में कितना सम्मान था। आंटी (एमिली शेंकल) को डर था कि उसे भारत में जो दुलार और प्रशंसा मिलेगी, उससे उसका दिमाग चढ़ सकता है।” फिर भी (अनिता) 1960 में भारत आई और उसने परिस्थितियों को बहुत अच्छी तरह से संभाला।.. उसने देश मे हर जगह मिला प्यार और सम्मान को बहुत गरिमा के साथ स्वीकार किया और इस बात को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
इस पुस्तक में लेखिका लिखतीं हैं, ..वह (एमिली शेंकल) कहीं दूर अंतरिक्ष में देख रही थीं, जब उन्होंने मुझसे कहा, “देखो, कृष्णा! तुम्हारे अंकल (नेताजी सुभाष चंद्र बोस) ने मुझसे कहा था कि मेरा पहला प्यार… और एकमात्र प्यार… मेरा देश है। सो, मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं बचा है।”
एक पत्र (5 मार्च 1936) में सुभाष (बाबू) ऐमिली (शेंकल) को लिखा था, ” मुझे नहीं पता कि भविष्य के गर्भ में मेरे लिए क्या है। हो सकता है कि मुझे अपना जीवन जेल में बिताना पड़े, हो सकता है कि मुझे गोली मार दी जाए या फाँसी पर चढ़ा दिया जाए।”…”हो सकता है कि मैं तुम्हें दोबारा कभी न देख सकूँ या फिर दोबारा वापस आने पर कभी पत्र न लिख सकूँ- लेकिन मेरा विश्वास करो कि तुम मेरे हृदय में, मेरे विचारों में और मेरे सपनों में जिंदा रहोगी।” …”किस्मत अगर हमें इस जीवन में अलग कर ही देती है तो मैं अगले जीवन में तुम्हारी कामना करूँगा।”
नेताजी की मृत्यु के बाद एमिली ने बड़ी हिम्मत से, अकेले ही अपनी बेटी अनीता को पाला। अनीता, अपने पिता के साथ-साथ, भारत का जिक्र भी हर दिन अपनी माँ से सुना करती थी। साल 1996 में जर्मनी में ही एमिली का निधन हो गया। पर जिस तरह नेताजी की वीरगाथा अमर हैं, उसी तरह उनकी और एमिली की प्रेम-कहानी भी अमर है!
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लेखिका लिखतीं हैं, उन्हें (नेताजी सुभाष चंद्र बोस) त्रिपुरी (मध्यप्रदेश) में कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता करनी थी, जब उन्हें निमोनिया और तेज बुखार हो गया था। चिकित्सकों ने उन्हें पूर्ण विश्राम के लिए कहा था लेकिन वह अधिवेशन में भाग लेने के प्रति अडिग थे। ऐसे में शरत चन्द्र बोस और उनके एक और भाई सुनील चन्द्र बोस, मशहूर चिकित्सक थे, उनके साथ गए। कांग्रेस अध्यक्ष को सभा स्थल पर स्ट्रेचर पर लाद कर ले जाना पड़ा। वहाँ वह अपना भाषण पढ़ने में असमर्थ थे, तो उसके बड़े भाई शरत चन्द्र बोस ने पढ़ कर सुनाया। इतिहास गवाह है कि कि त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान कांग्रेस नेतृत्व में गांधी जी के नजदीकी लोगों ने अपने निर्वासित और गंभीर रूप से बीमार अध्यक्ष के प्रति कैसा जहर-बुझा व्यवहार किया। इन चमचों ने यह अफवाह तक उड़ा दी थी कि सुभाष वास्तव में बीमार नहीं हैं, बल्कि बीमार होने का दिखावा कर रहे हैं।
लेखिका लिखतीं हैं, शिशिर (नेताजी के भतीजे व कृष्णा बोस की पति) ने मुझे (कृष्णा बोस) बताया था कि उनके पिता (शरत चन्द्र बोस) को संदेह था कि उसी जहाज पर स्वामी (स्वामी जर्मनी में नेताजी के सहयोगी के रूप में काम कर चुके थे और बाद में एक पनडुब्बी से दक्षिण पूर्व एशिया पहुंचे थे। वहाँ वह आईएनए की जासूसी शाखा के प्रभारी थे और मलाया के पेनांग में रंगरूटों को प्रशिक्षण देते थे। स्वतंत्र भारत में नेहरू सरकार ने उन्हें सेवा में लिया था।) का होना मात्र संयोग नहीं था और वह सरकार के निर्देश पर शरत बोस की यूरोप यात्रा पर निगाह रखने के लिए यात्रा कर रहे थे। इस बात की याद मुझे फिर 2015 में आई जब कुछ गोपनीय फाइलों के सार्वजनिक होने पर पता चला कि स्वतंत्र भारत में सरकारों ने शिशिर समेत बोस परिवार के कई सदस्यों की 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक जासूसी करवाई थी।
आगे लेखिका लिखतीं हैं, …हम एक बार वियना गए थे तो बातचीत में आंटी (एमिली शेंकल) ने कहा था कि उन्हें यह बात अच्छी तरह पता थी कि स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भारत की स्वतंत्रता में नेताजी के महान योगदान की जानबूझकर उपेक्षा की है या उसे कम महत्व का साबित किया है। उन्होंने हाथ से नीचे गिरने का इशारा करते हुए कहा था, “वे तुम्हारे अंकल (नेताजी सुभाषचंद्र बोस) के साथ ऐसा करते हैं।” लेकिन, इसी के साथ उन्हें भी खूब पता था कि भारत ही नहीं, पूरे उपमहाद्वीप में लोग उन्हें अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से याद करते हैं। उन्हें इस बात का फख्र था।
लेखिका लिखतीं हैं, 1995 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने अपने विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी को आंटी (एमिली शेंकल) और अनिता (बोस) से मिलने के लिए आग्सबर्ग भेजा गया। नरसिंहराव चाहते थे कि जापान के रेंकोजी मंदिर में 1945 से रखे हुए नेताजी के अवशेष भारत लाकर दिल्ली में किसी उचित स्थान पर रखे जाएँ। प्रधानमंत्री इसके लिए तीन लोगों की सहमति चाहते थे- नेताजी की पत्नी, बेटी और शिशिर (नेताजी के भतीजे) की। शिशिर और अनिता पहले से ही इस पक्ष में थे। श्री मुखर्जी जब आंटी (एमिली शेंकल) से मिलने गए तो उन्होंने भी इस बारे में अपनी सहमति प्रदान कर दी।…
नेताजी के जन्म शताब्दी वर्ष 1996 के अगस्त महीने में नेताजी के भौतिक अवशेषों को भारत लाने की प्रधानमंत्री नरसिंह राव की योजना भी पूरी नहीं हो सकी। योजना पर अमल होने के पहले ही आम चुनाव में नरसिंह राव हार गए थे।
इस पुस्तक को पढ़ कर नेताजी सुभाष बाबू के प्रति दिल में और श्रद्धा व प्रेम बढ़ जाता है। एक अहम व महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए।
नेताजी को शत-शत नमन।
कृष्णा बोस, एक सच्ची प्रेम कथा, एमिली और सुभाष, अनुवाद श्रीकांत अस्थाना, नियोगी बुक्स, नई दिल्ली, 2019