निश्चित रूप से गर्वित अरबों को कमतर करना मानवता के विरुद्ध एक अपराध होगा ताकि फ़िलिस्तीन को आंशिक रूप से या पूरी तरह से यहूदियों को उनके राष्ट्रीय घर के रूप में बहाल किया जा सके। फ़िलिस्तीन पर महात्मा गांधी (हरिजन, 26 नवंबर 1938) मुझे कई पत्र प्राप्त हुए हैं, जिनमें मुझसे फ़िलिस्तीन में अरब-यहूदी प्रश्न और जर्मनी में यहूदियों के उत्पीड़न के बारे में अपने विचार घोषित करने के लिए कहा गया है।
यह बिना किसी हिचकिचाहट के नहीं है कि मैं इस अत्यंत कठिन प्रश्न पर अपने विचार प्रस्तुत करने का साहस कर रहा हूँ। मेरी पूरी सहानुभूति यहूदियों के साथ है। मैं दक्षिण अफ़्रीका में उन्हें क़रीब से जानता रहा हूँ। उनमें से कुछ आजीवन साथी बन गये।
इन दोस्तों के माध्यम से मुझे उनके सदियों से चले आ रहे उत्पीड़न के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। वे ईसाई धर्म के अछूत रहे हैं। ईसाइयों द्वारा उनके साथ किये जाने वाले व्यवहार और हिंदुओं द्वारा अछूतों के साथ किये जाने वाले व्यवहार में बहुत समानता है। दोनों ही मामलों में उनके साथ हुए अमानवीय व्यवहार को उचित ठहराने के लिए धार्मिक स्वीकृति का सहारा लिया गया है।
इसलिए, मित्रता के अलावा, यहूदियों के प्रति मेरी सहानुभूति का अधिक समान सार्वभौमिक कारण है। लेकिन मेरी सहानुभूति मुझे न्याय की आवश्यकताओं के प्रति अंधा नहीं बनाती। यहूदियों के लिए राष्ट्रीय घर की मांग मुझे अधिक आकर्षित नहीं करती।

इसके लिए स्वीकृति बाइबिल में खोजी गई है और जिस दृढ़ता के साथ यहूदी फ़िलिस्तीन लौटने के लिए लालायित रहे हैं। धरती के अन्य लोगों की तरह, उन्हें उस देश को अपना घर क्यों नहीं बनाना चाहिए, जहाँ वे पैदा हुए हैं और जहाँ वे अपनी आजीविका कमाते हैं?
फ़िलिस्तीन उसी प्रकार अरबों का है, जिस प्रकार इंग्लैंड अंग्रेज़ों का या फ़्रांस फ़्रांसीसियों का है। यहूदियों को अरबों पर थोपना ग़लत और अमानवीय है। फ़िलिस्तीन में आज जो कुछ हो रहा है, उसे किसी भी नैतिक आचार संहिता द्वारा उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जनादेश को पिछले युद्ध के अलावा कोई स्वीकृति नहीं है। निश्चित रूप से गर्वित अरबों को कमतर करना मानवता के विरुद्ध एक अपराध होगा ताकि फ़िलिस्तीन को आंशिक रूप से या पूरी तरह से यहूदियों को उनके राष्ट्रीय घर के रूप में बहाल किया जा सके।
नेक कदम यह होगा कि यहूदियों के साथ उचित व्यवहार पर जोर दिया जाए, चाहे वे जहां भी पैदा हुए हों और पले-बढ़े हों। फ़्रांस में जन्मे यहूदी ठीक उसी अर्थ में फ़्रांसीसी हैं, जिस अर्थ में फ़्रांस में जन्मे ईसाई फ़्रांसीसी हैं। यदि यहूदियों के पास फ़िलिस्तीन के अलावा कोई घर नहीं है, तो क्या वे दुनिया के अन्य हिस्सों को छोड़ने के लिए मजबूर होने के विचार को पसंद करेंगे, जहां वे बसे हुए हैं? या क्या वे एक दोहरा घर चाहते हैं, जहाँ वे अपनी इच्छानुसार रह सकें? राष्ट्रीय घर के लिए यह आग्रह जर्मनी द्वारा यहूदियों के निष्कासन के लिए एक स्पष्ट औचित्य प्रदान करता है।
लेकिन ऐसा लगता है कि यहूदियों पर जर्मन उत्पीड़न का इतिहास में कोई उदाहरण नहीं है। पुराने ज़माने के तानाशाह कभी इतने पागल नहीं हुए थे, जितना हिटलर पागल हो गया लगता है। और, वह इसे धार्मिक उन्माद के साथ कर रहा है।
क्योंकि, वह ऐसे विशिष्ट और उग्र राष्ट्रवाद के एक नये धर्म का प्रचार कर रहा है, जिसके नाम पर कोई भी अमानवीयता मानवीय कार्य बन जाती है, जिसका इहलोक और परलोक में पुरस्कार मिलेगा। एक स्पष्ट रूप से पागल, लेकिन निडर युवक का अपराध का प्रभाव पूरी नस्ल पर अविश्वसनीय क्रूरता के साथ होता दिख रहा है।
यदि मानवता के नाम पर और उसके लिए कभी भी कोई उचित युद्ध हो सकता है, तो पूरी नस्ल के अनियंत्रित उत्पीड़न को रोकने के लिए जर्मनी के खिलाफ युद्ध पूरी तरह से उचित होगा। लेकिन मैं किसी युद्ध में विश्वास नहीं रखता। इसलिए, ऐसे युद्ध के फ़ायदे और नुक़सान की चर्चा मेरे क्षितिज या क्षेत्र से बाहर है।
लेकिन अगर जर्मनी के ख़िलाफ़ कोई युद्ध नहीं हो सकता, यहां तक कि यहूदियों के ख़िलाफ़ किये जा रहे अपराध के लिए भी, तो निश्चित रूप से जर्मनी के साथ कोई गठबंधन नहीं हो सकता। एक राष्ट्र, जो न्याय और लोकतंत्र के लिए खड़े होने का दावा करता है और एक, जो दोनों का घोषित दुश्मन है, के बीच गठबंधन कैसे हो सकता है? या क्या इंग्लैंड सशस्त्र तानाशाही और उसके सभी साधनों की ओर बढ़ रहा है?
जर्मनी दुनिया को दिखा रहा है कि हिंसा से कितनी कुशलता से काम लिया जा सकता है, जब मानवतावाद के भेष में किसी भी पाखंड या कमज़ोरी से इसमें बाधा न आए। वह यह भी दिखा रहा है कि अपनी नग्नता में यह कितना घृणित, भयानक और भयावह दिखता है।
क्या यहूदी इस संगठित और बेशर्म उत्पीड़न का विरोध कर सकते हैं? क्या उनके आत्म-सम्मान को सुरक्षित रखने तथा असहाय, उपेक्षित और निराश महसूस न करने का कोई रास्ता है? मेरा निवेदन है कि वह है। ईश्वर में विश्वास रखने वाले किसी भी व्यक्ति को असहाय या निराश महसूस करने की आवश्यकता नहीं है।
यहूदियों का यहोवा ईसाइयों, मुसलमानों या हिंदुओं के ईश्वर की तुलना में अधिक व्यक्तिगत भगवान है, हालांकि वास्तव में, संक्षेप में, वह सभी के लिए आम है और उसके बरक्स को दूसरा नहीं है और वह विवरण से परे है। चूंकि यहूदी व्यक्तित्व का श्रेय ईश्वर को देते हैं और मानते हैं कि वह उनके हर कार्य को नियंत्रित करता है, इसलिए उन्हें असहाय महसूस नहीं करना चाहिए।
यदि मैं एक यहूदी होता और जर्मनी में पैदा होता और वहीं अपनी आजीविका कमाता, तो मैं सबसे ऊंचे गैर-यहूदी जर्मन के बराबर जर्मनी को अपना घर होने का दावा करता, और उसे चुनौती देता कि वह मुझे गोली मार दे या मुझे कालकोठरी में डाल दे; मैं निष्कासित होने या भेदभावपूर्ण व्यवहार सहने से इंकार कर दूँगा।
और ऐसा करने के लिए यह इंतज़ार नहीं करता कि अन्य यहूदी नागरिक प्रतिरोध में मेरे साथ शामिल होंगे, लेकिन मुझे विश्वास होता कि अंतत: बाक़ी लोग भी मेरे उदाहरण का अनुसरण करेंगे। और अब फ़िलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक संदेश. मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे ग़लत रास्ते पर जा रहे हैं।
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बाइबिल की अवधारणा का फ़िलिस्तीन एक भौगोलिक पथ नहीं है। यह उनके दिल में है. लेकिन अगर उन्हें भूगोल के फ़िलिस्तीन को अपने राष्ट्रीय घर के रूप में देखना है, तो ब्रिटिश बंदूक की छाया में इसमें प्रवेश करना ग़लत है। संगीन या बम की सहायता से कोई धार्मिक कार्य नहीं किया जा सकता। अरबों की सद्भावना से ही वे फ़िलिस्तीन में बस सकते हैं। उन्हें अरब हृदय के परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए। वही ईश्वर अरब हृदय पर शासन करता है, जो यहूदी हृदय पर शासन करता है। वे अपनी धार्मिक आकांक्षा में विश्व मत को अपने पक्ष में पाएंगे। अरबों के साथ तर्क करने के सैकड़ों तरीके हैं, यदि वे केवल ब्रिटिश संगीन की मदद को त्याग देंगे।
वैसे भी, वे उन लोगों को बर्बाद करने में अंग्रेजों के सह-भागीदार हैं, जिन्होंने उनके साथ कुछ भी ग़लत काम नहीं किया है। मैं अरब ज़्यादतियों का बचाव नहीं कर रहा हूँ. काश, उन्होंने उस चीज़ का विरोध करने के लिए अहिंसा का रास्ता चुना होता, जिसे वे उचित ही अपने देश पर अनुचित अतिक्रमण मानते थे।
लेकिन सही और ग़लत के स्वीकृत सिद्धांतों के अनुसार, बड़ी बाधाओं के सामने अरब प्रतिरोध के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। यहूदियों, जो चुनी हुई नस्ल होने का दावा करते हैं, को अपने दावे की पुष्टि के लिए अहिंसा का रास्ता चुनकर धरती पर स्थिति को साबित करना चाहिए।
फ़िलिस्तीन सहित हर देश उनका घर है, पर आक्रामकता से नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण सेवा से. एक यहूदी मित्र ने मुझे सेसिल रोथ की ‘द जेविश कंट्रीब्यूशन टू सिविलाइज़ेशन’ नामक पुस्तक भेजी है। इसमें यह विवरण है कि यहूदियों ने दुनिया के साहित्य, कला, संगीत, नाटक, विज्ञान, चिकित्सा, कृषि आदि को समृद्ध करने के लिए क्या किया है।
यहूदी अपनी इच्छा से पश्चिम से बहिष्कृत माने जाने से, तिरस्कृत होने या संरक्षित होने से इनकार कर सकते हैं। वे ईश्वर द्वारा अमान्य बर्बरता में डूबने के बजाय ईश्वर द्वारा चुनी हुई नस्ल होकर दुनिया का ध्यान और सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। वे अपने कई योगदानों में अहिंसक कार्रवाई का उत्कृष्ट योगदान भी जोड़ सकते हैं।
अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ें: bargad.wordpress.com/2011/10/02/gan
एक अछूत परिवार ने साबरमती आश्रम में स्थायी रूप से रहने की इच्छा प्रकट की । गांधीजी ने उन्हें आश्रम में दाखिल कर लिया। इस पर तूफान उठ खड़ा हुआ। आश्रम की स्त्रियों ने अछूत स्त्री को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया | कस्तूरबा को तो इस विचार से ही घृणा हुई कि दानी बहन रसोई में भोजन बनाए और बरतन साफ करे। गांधीजी ने समझा-बुझाकर उन्हें राजी कर लिया।

कुछ ही समय बाद गांधीजी ने घोषणा की कि उन्होंने अछूत कन्या लक्ष्मी को अपनी पुत्री बना लिया है। इस प्रकार कस्तूरबा एक अछूत की माता बन गईं !
गांधीजी ने जोर दिया कि अस्पृश्यता प्रारंभिक हिन्दू धर्म का अंग नहीं है । वस्तुत: अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका संघर्ष हिन्दू धर्म के नाम पर ही हुआ। उन्होंने लिखा है- “मैं फिर से जन्म नहीं लेना चाहता, लेकिन यदि लेना ही पड़े, तो मैं अस्पृश्य के रूप में पैदा होना चाहूँगा, जिससे मैं उनकी वेदनाओं, कष्टों और उनके साथ किए जानेवाले दुर्व्यवहारों में साझीदार हो सकूँ और जिससे मैं अपने को और उनको दुःखदायी स्थिति से मुक्त कर सकूँ।”
लेकिन अगले जन्म में अछूत पैदा होने से पहले इस जन्म में ही वह अस्पृश्य की भाँति रहने लगे। वह आश्रम के पाखाने साफ करने लगे। उनके संगी-साथी भी साथ हो गए। अब अछूत कोई न रहा, क्योंकि बिना छूत-छात के विचार के हर कोई अछूत का काम करता था। नीच जाति के लोग अछूत कहलाते थे। गांधीजी ने उनके मनोविज्ञान को समझा और अपने को ‘हरिजन’ कहना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने अपने साप्ताहिक पत्र का नाम ‘हरिजन’ रखा धीरे-धीरे ‘हरिजन’ शब्द प्रयोग में आकर गौरवशाली बन गया।
धर्मांध हिन्दुओं ने अछूतों को प्रेम करने के लिए गांधीजी को कभी क्षमा नहीं किया। अपने जीवन में गांधीजी को जिन राजनैतिक बाधाओं का सामना करना पड़ा, उनमें से बहुतों के लिए धर्मांध हिन्दू जिम्मेदार थे। लेकिन बहुसंख्यक लोगों के लिए वह महात्मा थे। वह उनसे आशीर्वाद माँगते थे, खुशी-खुशी उनके पैर छूते थे। इसलिए उन्हें इस बात को दरगुज़र करना पड़ा और वह भूल गए कि वह अछूतों की भाँती कलुषित हैं, क्योंकि वह सफाई का काम करते हैं और अछूतों के साथ रहते हैं और उनके पास एक अछूत लड़की रहती है।
बरसों तक लाखों सवर्ण हिन्दू गांधीजी के आश्रम में उनसे मिलने, उनके साथ खाना खाने और टहलने आते रहे। उनमें से कुछ ने अपने को बाद में शुद्ध किया; लेकिन अधिकांश लोग इतने कायर नहीं थे | अस्पृश्यता का थोड़ा-बहुत अभिशाप दूर हो गया | गांधी- विचारधारा के लोग अछूतों को अपने घरों में रखने लगे। गांधीजी ने अपने उदाहरण से शिक्षा दी।
इतिहास के पन्नों में भुला दिए गए स्वतंत्रता सेनानी मगफूर ऐजाज़ी
शहरी जीवन और औद्योगीकरण के कारण हरिजनों के प्रति अत्याचारों में कमी आई | देहात में लोग एक-दूसरे को जानते हैं; लेकिन अछूत कुछ और तरह का तो लगता नहीं है। रेल-मोटर में सवर्ण हिन्दू उनके साथ सटकर बैठते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता | इस प्रकार के अनिवार्य संपर्क से भी हिन्दुओं को हरिजनों के साथ मिलने-जुलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
फिर भी हरिजनों की गरीबी बनी रही और उनकी ओर से किए गए गांधीजी के प्रारंभिक कार्यों, संकेतों और वक्तव्यों से छुआछूत दूर नहीं हुई । इसलिए गांधीजी को अपना प्रयत्न निरंतर जारी रखना पड़ा। गांधीजी के ऊपर ही यह भार क्यों आकर पड़ा कि वह हरिजनोद्धार का आंदोलन चलाएँ ? और कोई क्यों नहीं ?

1914 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतिम चरण के नायक थे। इसके अलावा गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका का 21 वर्ष का संघर्ष एक बुराई को दूर करने के लिए था, जिसकी जड़ में, आर्थिक प्रश्नों के साथ-साथ रंग-भेद भी था। असमान दैवी देनों के साथ सब मनुष्यों का जन्म होता है, पर उनके अधिकार समान होते हैं।
समाज का कर्तव्य है कि वह उन्हें अपनी योग्यता के विकास तथा स्वतंत्र रहने के लिए समान, अथवा कम-से-कम, खुले अवसर प्रदान करे । तब गांधीजी, जो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समानता के लिए लड़कर ताजे लौटे थे, अपने देश में ही देशवासियों द्वारा देशवासियों पर थोपी हुई क्रूर असमानता को कैसे सहन कर सकते थे ? जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने धर्म, विश्वास अथवा अपने पूर्वजों या संबंधियों के कार्य, नाक की शक्ल, खाल के रंग, नाम-बोध अथवा अपने जन्म-स्थान के कारण, समान अधिकारों से वंचित किया जाता है, वहाँ आजादी की नींव खोखली हो जाती है।
भारत के लिए गांधीजी की आजादी की कल्पना में हिन्दू-अनैतिकता तथा ब्रिटिश शासकों के लिए कोई स्थान न था। उन्होंने 25 मई 1921 के यंग इंडिया में लिखा-“यदि हम भारत के पाँचवें अंग को सतत् गुलामी में रखते हैं, तो स्वराज्य अर्थहीन है। यदि हम स्वयं अमानवीय रहेंगे, तो भगवान् के दरबार में हम दूसरों की अमानवीयता से छुटकारे के लिए कैसे याचना कर सकते हैं ?”
अछूतों के प्रति गांधीजी का रुख साफ था और वह यह कि अस्पृश्यता को वह सहन नहीं कर सकते थे। सच तो यह है कि मनुष्यों के इस अमानवीय बहिष्कार से वह इतने व्यथित थे कि उन्होंने कहा-
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“यदि मेरे सामने यह सिद्ध हो जाय कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म आवश्यक अंग है, तो मैं अपने को ऐसे धर्म के प्रति विद्रोही घोषित कर दूँगा ।” लोकप्रियता का इच्छुक कोई भी व्यक्ति ऐसा सार्वजनिक वक्तव्य नहीं दे सकता था, विशेषकर ऐसे देश में, जहाँ रूढ़िवादी हिन्दुओं का बहुमत था। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा उन्होंने हिन्दू की हैसियत से अपने धर्म को परिष्कृत करने के लिए किया। उनकी दृष्टि में अस्पृश्यता में एक बड़ी व्याधि थी।
धर्मभीरु हिन्दू हरिजनों को अलग रहते देखकर संतुष्ट थे। फिर भी पृथकता में ऐक्य साधने का भारतीय आदर्श तो था ही और उन्हें जोड़नेवाली तीन बातें हैं: संस्कृति की अखंड रेखा, जो धुंधले अतीत से आज दिन तक चली आती है, इतिहास की श्रृंखला, और रक्त तथा धर्म के बंधन, रक्त हिन्दुओं को मुसलमानों और सिखों से जोड़ता है। धर्म इस संबंध को कमजोर करता है, भूगोल जोड़ता है, यातायात के भद्दे साधन विभाजन कर देते हैं, भाषाओं की विविधता भी उन्हें अलग करती है। इन सब तत्त्वों के बीच से गांधीजी और उनकी पीढ़ी को एक राष्ट्र का निर्माण करना था।
लुई फिरर, गांधी की कहानी, अनु. चंद्रगुप्त वार्ष्णेय, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
बारह बरस की उम्र तक मैंने जो भी शिक्षा पाई, वह मातृभाषा गुजराती में ही पाई थी। उस समय गणित, इतिहास और भूगोल का मुझे थोड़ा-थोड़ा ज्ञान था। इसके बाद मैं एक हाईस्कूल में दाखिल हुआ। इसमें भी पहले तीन साल तो मातृभाषा ही शिक्षा का माध्यम रही।
लेकिन स्कूल मास्टर का काम तो हम विद्यार्थियों के दिमाग़ में जबर्दस्ती अंग्रेज़ी ठूंसना था। इसलिए हमारा आधे से अधिक समय अंग्रेज़ी और उसके हिज्ज़ों तथा उच्चारण के काबू पाने में लगाया जाता थ। अंग्रेज़ी भाषा को पढ़ना हमारे लिए कष्टपूर्ण अनुभव था।
सबसे अधिक जिल्लत तब हुई जब सारे विषय की पढ़ाई अपनी मातृभाषा में करने के बज़ाय अंग्रेज़ी में पढ़ना शुरू करना पड़ा। कक्षा में अगर कोई विद्यार्थी गुजराती, जिसे वह समझता था, बोलता तो उसे सजा दी जाती थी। अंग्रेज़ी को, जिसे न तो वह पूरी तरह समझ सकता था और न शुद्ध बोल सकता था, अगर वह बुरी तरह बोलता तो भी शिक्षक को आपत्ती नहीं होती थी।
शिक्षक भला इस बात की फ्रिक क्यों करें? क्योंकि ख़ुद उसकी अंग्रेज़ी निर्दोष नहीं थी, इसके सिवा और हो भी क्या सकता था? क्योंकि अंग्रेज़ी उनके लिए भी उसी तरह विदेशी भाषा थी, जिसतरह उनके विद्यार्थियों के लिए भी। इससे बड़ी गड़बढ़ होती थी। हम विद्यार्थियों ने अनेक बातें कंठस्त कर रखी थी, हालांकि हम उसे पूरी तरह से समझ नहीं सकते थे।
मेरी पूरी हाईस्कूल की शिक्षा तो अंग्रेज़ी की सांस्कृतिक विजय के लिए थी, हमने जो भी ज्ञान प्राप्त किया वह हम तक ही सीमित था, वह सर्वसाधारण तक पहुँचने के लिए तो था ही नहीं।
हमारी झूठी अभारतीय शिक्षा से लाखों आदमियों का दिन-दिन जो अधिकाधिक नुक़सान हो रहा है, उसका प्रमाण मैं रोज़ ही पा रहा हूँ। जो ग्रेज्युएट मेरे आदरणीय साथी हैं, उन्हें जब अपने आन्तिरिक विचारों को व्यक्त करना पड़ता है, तब वे ख़ुद ही परेशान हो जाते हैं। वे तो अपने ही घरों में अजनबी बन गए हैं।
अपनी मातृभाषा के शब्दों का उनका ज्ञान इतना सीमित है कि अंग्रेज़ी शब्दों और वाक्यों तक का सहारा लिए बगैर वे अपने भाषण को सामाप्त नहीं कर सकते और न अंग्रेज़ी किताबों के बगैर वे रह सकते हैं। आपस में भी वे अक्सर अंग्रेज़ी में ही लिखा-पढ़ी करते हैं।
अपने साथियों का उदाहरण मैं यह बताने के लिए दे रहा हूँ कि इस बुआई ने कितनी गहरी जड़ जमा ली है। क्योंकि हम लोगों ने अपने को सुधारने का ख़ुद जान-बूझकर प्रयत्न नहीं किया है।
https://thecrediblehistory.com/featured/when-annie-besant-stopped-gandhiji-speech-at-banaras-hindu-university/
हमारे कॉलेजों में जो समय की बरबादी होती है, उस पक्ष में दलील यह दी जाती है कि कॉलेजों में पढ़ने के कारण इतने विद्यार्थियों में से अगर एक जगदीश बसु भी पैदा हो सके, तो हमें बरबारी की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं।
अगर यह बरबादी अनिवार्य होती तो मैं ज़रूर इस दलील का समर्थन करता, लेकिन मैं आशा करता हूँ कि मैंने यह बतला दिया है कि यह न तो पहले अनिवार्य थी और न आज ही अनिवार्य है। क्योंकि जगदीश बसु कोई वर्तमान शिक्षा की उपज नहीं थे। वे तो भयंकर कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद अपने परिश्रम की बदौलत ऊंचे उठे और उनका ज्ञान लगभग ऐसा बन गया जो सर्वसाधारण तक नहीं पहुँच सकता।
बल्कि मालूम ऐसा पड़ता है कि हम यह सोचने लगे हैं कि जब तक कोई अंग्रेज़ी न जाने, तब तक वह बसु के सदृश महान वैज्ञानिक होने की आशा नहीं कर सकता। यह ऐसी मिथ्या धारणा है, जिसमें अधिक बड़ी की मैं कल्पना ही नहीं कर सकता। जिस तरह हम अपने को लाचार समझते मालूम पड़ते हैं, उस तरह एक भी जापानी अपने को नहीं समझता।
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शिक्षा का माध्यम तो एकदम और हर हालत में बदला जाना चाहिए और प्रान्तीय भाषाओं को उनका न्यायसंगत स्थान मिलना चाहिए। यह जो दंडनीय बरबादी रोज-ब-रोज हो रही है, इसके बजाय तो मैं अस्थायी रूप से अव्यवस्था हो जाना भी ज़्यादा पसंद करूंगा।
प्रान्तीय भाषाओं का दर्जा और व्यावहारिक मूल्य बढ़ाने के लिए मैं चाहूंगा कि अदालतों की कार्यवाही अपने-अपने प्रान्त की भाषा में हो। प्रान्तीय धारा सभाओं की कार्यवाही भी प्रान्तीय भाषा में हो या एक से अधिक भाषाएँ प्रचलित हों।
धारा सभाओं के सदस्यों से मैं कहना चाहता हूँ कि वे चाहे तो एक महीने के अन्दर-अन्दर अपने प्रान्तों की भाषाएँ भली-भाती समझ सकते हैं। तमिल भाषी के लिए ऐसी कोई रुकावट नहीं कि वह तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ का, जो कि सब तमिल से मिलती-जुलती ही हैं, मामूली व्याकरण और कुछ सौ शब्द आसानी से न सीख सके।
केंन्द्र में हिन्दुस्तानी का प्रमुख स्थान रहना चाहिए। मेरी सम्मति में यह कोई ऐसा प्रश्न नहीं, जिसका निर्णय साहित्यिकों के द्वारा हो। वे इस बात का निर्णय नहीं कर सकते कि किस स्थान के लड़के-लड़कियों की पढ़ाई किस भाषा में हो। क्योंकि इस प्रश्न का निर्णय कर सकते हैं कि किन विषयों की पढ़ाई हो।
यह उस देश की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है, जिस देश के बालकों को शिक्षा देनी हो। उनमें तो बस यही सुविधा प्राप्त है कि राष्ट्र की इच्छा को यथासम्भव सर्वोत्तम रूप में अमल में लाए। अत: जब हमारा देश वस्तुत: स्वतंत्र होगा, तब शिक्षा का प्रश्न केवल एक ही तरह से हल होगा।
साहित्यक लोग पाठ्यक्रम बनाएंगे और फिर उनके अनुसार पाठ्य-पुस्तकें तैयार करेगे और स्वतंत्र भारत की शिक्षा पानेवाले लोग देश की ज़रूरते उसी तरह पूरी करंगे जिस तरह आज वे विदेशी शासकों की ज़रूरतें पूरी करते हैं।
जब तक हम शिक्षित वर्ग इस प्रश्न के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे, तब तक मुझे इस बात का भय है कि हम जिस स्वतंत्र और स्वस्थ भारत का स्वप्न देखते हैं, उसका निर्माण कर पाएंगे।
हमें जी-तोड़ प्रयत्न करके अपने बन्धन से मुक्त होना चाहिए, चाहे वह शिक्षात्मक हो, आर्थिक हो, सामाजिक हो या राजनीतिक हो। हमारी तीन-चौथाई लड़ाई तो वह प्रयत्न होगा जो कि इसके लिए किया जाएगा।
संदर्भ
हरिजन सेवक, 9.7.1938