एक अछूत परिवार ने साबरमती आश्रम में स्थायी रूप से रहने की इच्छा प्रकट की । गांधीजी ने उन्हें आश्रम में दाखिल कर लिया। इस पर तूफान उठ खड़ा हुआ। आश्रम की स्त्रियों ने अछूत स्त्री को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया | कस्तूरबा को तो इस विचार से ही घृणा हुई कि दानी बहन रसोई में भोजन बनाए और बरतन साफ करे। गांधीजी ने समझा-बुझाकर उन्हें राजी कर लिया।

कुछ ही समय बाद गांधीजी ने घोषणा की कि उन्होंने अछूत कन्या लक्ष्मी को अपनी पुत्री बना लिया है। इस प्रकार कस्तूरबा एक अछूत की माता बन गईं !
गांधीजी ने जोर दिया कि अस्पृश्यता प्रारंभिक हिन्दू धर्म का अंग नहीं है । वस्तुत: अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका संघर्ष हिन्दू धर्म के नाम पर ही हुआ। उन्होंने लिखा है- “मैं फिर से जन्म नहीं लेना चाहता, लेकिन यदि लेना ही पड़े, तो मैं अस्पृश्य के रूप में पैदा होना चाहूँगा, जिससे मैं उनकी वेदनाओं, कष्टों और उनके साथ किए जानेवाले दुर्व्यवहारों में साझीदार हो सकूँ और जिससे मैं अपने को और उनको दुःखदायी स्थिति से मुक्त कर सकूँ।”
लेकिन अगले जन्म में अछूत पैदा होने से पहले इस जन्म में ही वह अस्पृश्य की भाँति रहने लगे। वह आश्रम के पाखाने साफ करने लगे। उनके संगी-साथी भी साथ हो गए। अब अछूत कोई न रहा, क्योंकि बिना छूत-छात के विचार के हर कोई अछूत का काम करता था। नीच जाति के लोग अछूत कहलाते थे। गांधीजी ने उनके मनोविज्ञान को समझा और अपने को ‘हरिजन’ कहना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने अपने साप्ताहिक पत्र का नाम ‘हरिजन’ रखा धीरे-धीरे ‘हरिजन’ शब्द प्रयोग में आकर गौरवशाली बन गया।
धर्मांध हिन्दुओं ने अछूतों को प्रेम करने के लिए गांधीजी को कभी क्षमा नहीं किया। अपने जीवन में गांधीजी को जिन राजनैतिक बाधाओं का सामना करना पड़ा, उनमें से बहुतों के लिए धर्मांध हिन्दू जिम्मेदार थे। लेकिन बहुसंख्यक लोगों के लिए वह महात्मा थे। वह उनसे आशीर्वाद माँगते थे, खुशी-खुशी उनके पैर छूते थे। इसलिए उन्हें इस बात को दरगुज़र करना पड़ा और वह भूल गए कि वह अछूतों की भाँती कलुषित हैं, क्योंकि वह सफाई का काम करते हैं और अछूतों के साथ रहते हैं और उनके पास एक अछूत लड़की रहती है।
बरसों तक लाखों सवर्ण हिन्दू गांधीजी के आश्रम में उनसे मिलने, उनके साथ खाना खाने और टहलने आते रहे। उनमें से कुछ ने अपने को बाद में शुद्ध किया; लेकिन अधिकांश लोग इतने कायर नहीं थे | अस्पृश्यता का थोड़ा-बहुत अभिशाप दूर हो गया | गांधी- विचारधारा के लोग अछूतों को अपने घरों में रखने लगे। गांधीजी ने अपने उदाहरण से शिक्षा दी।
इतिहास के पन्नों में भुला दिए गए स्वतंत्रता सेनानी मगफूर ऐजाज़ी
शहरी जीवन और औद्योगीकरण के कारण हरिजनों के प्रति अत्याचारों में कमी आई | देहात में लोग एक-दूसरे को जानते हैं; लेकिन अछूत कुछ और तरह का तो लगता नहीं है। रेल-मोटर में सवर्ण हिन्दू उनके साथ सटकर बैठते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता | इस प्रकार के अनिवार्य संपर्क से भी हिन्दुओं को हरिजनों के साथ मिलने-जुलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
फिर भी हरिजनों की गरीबी बनी रही और उनकी ओर से किए गए गांधीजी के प्रारंभिक कार्यों, संकेतों और वक्तव्यों से छुआछूत दूर नहीं हुई । इसलिए गांधीजी को अपना प्रयत्न निरंतर जारी रखना पड़ा। गांधीजी के ऊपर ही यह भार क्यों आकर पड़ा कि वह हरिजनोद्धार का आंदोलन चलाएँ ? और कोई क्यों नहीं ?

1914 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतिम चरण के नायक थे। इसके अलावा गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका का 21 वर्ष का संघर्ष एक बुराई को दूर करने के लिए था, जिसकी जड़ में, आर्थिक प्रश्नों के साथ-साथ रंग-भेद भी था। असमान दैवी देनों के साथ सब मनुष्यों का जन्म होता है, पर उनके अधिकार समान होते हैं।
समाज का कर्तव्य है कि वह उन्हें अपनी योग्यता के विकास तथा स्वतंत्र रहने के लिए समान, अथवा कम-से-कम, खुले अवसर प्रदान करे । तब गांधीजी, जो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समानता के लिए लड़कर ताजे लौटे थे, अपने देश में ही देशवासियों द्वारा देशवासियों पर थोपी हुई क्रूर असमानता को कैसे सहन कर सकते थे ? जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने धर्म, विश्वास अथवा अपने पूर्वजों या संबंधियों के कार्य, नाक की शक्ल, खाल के रंग, नाम-बोध अथवा अपने जन्म-स्थान के कारण, समान अधिकारों से वंचित किया जाता है, वहाँ आजादी की नींव खोखली हो जाती है।
भारत के लिए गांधीजी की आजादी की कल्पना में हिन्दू-अनैतिकता तथा ब्रिटिश शासकों के लिए कोई स्थान न था। उन्होंने 25 मई 1921 के यंग इंडिया में लिखा-“यदि हम भारत के पाँचवें अंग को सतत् गुलामी में रखते हैं, तो स्वराज्य अर्थहीन है। यदि हम स्वयं अमानवीय रहेंगे, तो भगवान् के दरबार में हम दूसरों की अमानवीयता से छुटकारे के लिए कैसे याचना कर सकते हैं ?”
अछूतों के प्रति गांधीजी का रुख साफ था और वह यह कि अस्पृश्यता को वह सहन नहीं कर सकते थे। सच तो यह है कि मनुष्यों के इस अमानवीय बहिष्कार से वह इतने व्यथित थे कि उन्होंने कहा-
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“यदि मेरे सामने यह सिद्ध हो जाय कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म आवश्यक अंग है, तो मैं अपने को ऐसे धर्म के प्रति विद्रोही घोषित कर दूँगा ।” लोकप्रियता का इच्छुक कोई भी व्यक्ति ऐसा सार्वजनिक वक्तव्य नहीं दे सकता था, विशेषकर ऐसे देश में, जहाँ रूढ़िवादी हिन्दुओं का बहुमत था। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा उन्होंने हिन्दू की हैसियत से अपने धर्म को परिष्कृत करने के लिए किया। उनकी दृष्टि में अस्पृश्यता में एक बड़ी व्याधि थी।
धर्मभीरु हिन्दू हरिजनों को अलग रहते देखकर संतुष्ट थे। फिर भी पृथकता में ऐक्य साधने का भारतीय आदर्श तो था ही और उन्हें जोड़नेवाली तीन बातें हैं: संस्कृति की अखंड रेखा, जो धुंधले अतीत से आज दिन तक चली आती है, इतिहास की श्रृंखला, और रक्त तथा धर्म के बंधन, रक्त हिन्दुओं को मुसलमानों और सिखों से जोड़ता है। धर्म इस संबंध को कमजोर करता है, भूगोल जोड़ता है, यातायात के भद्दे साधन विभाजन कर देते हैं, भाषाओं की विविधता भी उन्हें अलग करती है। इन सब तत्त्वों के बीच से गांधीजी और उनकी पीढ़ी को एक राष्ट्र का निर्माण करना था।
लुई फिरर, गांधी की कहानी, अनु. चंद्रगुप्त वार्ष्णेय, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
मिथूबेन का जन्म 11 अप्रैल 1892 को प्रख्यात पारसी सामंत और उद्योगपति सर दिनशां मानेकजी पेटिट के परिवार में हुआ। उनकी मौसी जैजीबेन जहांगीर पेटिट गांधीजी की घोर प्रशंसिका थीं। दक्षिण अफ्रीका से गांधीजी के वापस आने के बाद 1915 में राष्ट्रीय स्त्री सभा की सचिव बनी। वे जब भी गांधीजी से मिलने जाती मिथूबेन को साथ ले जाती थी। मिथूबेन पर गांधीजी के विचारों और सिद्धांतो का गहरा प्रभाव पड़ा।
दांडी मार्च में प्रमुख भूमिकाओं में शामिल रही, कस्तूरबा गांधी के साथ साबरमती से मार्च शुरु होने के बाद, 6 अप्रैल 1930 को सरोजिनी नायडू के साथ मिलकर उन्होंने दांडी में पहली बार नमक कानून तोड़ा और 9 अप्रैल 1930 को भीमराद मे पुन: उल्लंघने दोहराया। मिथूबेन पेटिट उन महिलाओं में से एक थी जिन्होंने यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और नमक कर के खिलाफ नागरिक अवज्ञा की।
पेटिट बारडोली सत्याग्रह में भी शामिल रही थी जो अंग्रेज सरकार के खिलाफ कोई कर नहीं अभियान था, जहां उन्होंने सरदार पटेल के मार्गदर्शन में काम किया था। महात्मा गांधी के साथियों के समूह में मिथूबेन पेटिट काफी अहम थी। गांधीजी ने भविष्य के ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक-सामाजिक सशक्तिकरण के प्रयास के लिए मिथूबेन पेटिट को चुना और महिलाओं में मौजूद अपार रचनात्मक शक्ति को निखार कर उन्हें ग्राम उद्यमी बनाने के लिए प्रेरिर किया।
अपने परिवार से अलग-थलग रहकर त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने का लक्ष्य चुना। गांधीजी ने जब ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक कार्य करने के लिए महिलाओं को कहा- तब मिथूबेन पूरी तरह से ग्रामोत्थान के कार्य में तल्लीन हो गई।
मरोली में कस्तूरबा वणतशाला(कस्तूरबा बुनाई शाला) की स्थापना 1 दिसंबर 1930 को हुई थी। जहां मछुआरों, हरिजनो, आदिवासियों तथा उनके समान वंचित वर्गों के बालको को भरती करके वहा कताई, बुनाई, धुनाई, दूध पालन, चमड़े का काम आदि ग्रामउद्योग सिखाया जाता था।
शाला की नींव 1931 में गांधीजी ने अपने हाथों से खान अब्दुल गफ्फार खान, सरदार वल्लभ भाई पटेल और मीरा बेन के उपस्थिति में रखा था। उन्होंने उनसे पूछा था : जब तुमने नीव रखने के लिए मुझसे कहा था क्या उस समय तुमने अपनी जिम्मेदारी महसूस कर ली थी।
मिथूबेन का उत्तर था- हां बापू ! मैं वचन देती हूं कि मैं अपनी मृत्यु के समय तक यहां काम करूंगी।[i]
गांधीजी ने सार्वजनिक सभा में मिथूबेन की सराहना करते हुए कहा था।
आज आप अपने सामने एक पारसी महिला को देख रहे हैं जो एक प्रख्यात परिवार से आई है और जो इससे पहले कभी मुबंई के आरामदेह तथा वैभवपूर्ण जीवन से अलग नहीं रही है। अब वह मोटी खादी के वस्त्रों में, दिन और रात, ठंड और वर्षा की परवाह किए बिना नंगे पैर घूम रही है। इस सबसे दरिद्र बालकों के साथ, बैठने, उनके लिए दान मांगने से, उसके काम में कोई अंतर नहीं पड़ता। यदि 10 वर्ष पूर्व किसी ने मुझसे ऐसा कहा होता तो मैं उस पर विश्वास नहीं कर सकता था। आज यह एक वास्तविकता है।[ii]
मिथूबेन पेटिटम, जिनको लोग ”माईजी“ कहकर पुकारते थे, उन महिलाओं में से थी जो नमक सत्याग्रह में शामिल हुई और उनके जीवन-चिंतन में महत्वपूर्ण बदलाव आ गया। दांडी यात्रा कूच के बाद, शराब के दुकानों पर धरना उन्होंने पूरी निर्भीकता और प्रतिबद्धता के साथ दिया। गुजरात में, विशेषत: सूरत जिले की महिलाओं ने सामाजिक पुनरुत्थान के अपने अभियान में, कस्तूरबा तथा मिथूबेन के मार्गदर्शन में, सर्वोच्च प्राथमिकता धरने की थी।
स्वतंत्र भारत में स्वयं को सत्ता के दौड़ से दूर रखा और गांधीवादी मूल्यों के दम पर नि:स्वार्थ सेवा के आर्दश का अनुसरण किया।
मरोली में कस्तूरबा वणतशाला(कस्तूरबा बुनाई शाला) में चार आश्रमशालाएं चलती थी। जहां लड़कियों के शिक्षा के साथ-साथ ग्राम-उद्योग के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता था। यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित लड़कियों को डिप्लोमा पाठ्यक्रम के स्तर का प्रमाणपत्र दिया जाता था।
इसके साथ-साथ एक मानसिक चिकत्सालय भी चलाया जाता था। जिसमें ब्रिटिश राज की जेलों में दी गई शारीरिक यातनाएं भोगने के कारण कुछ राजनीतिक बंदी मानसिक रूप से बीमार हो जाते थे। उनका इलाज किया जाता था। कस्तूरबा वणतशाला(कस्तूरबा बुनाई शाला) में शिक्षा और स्वास्थ्य का असामान्य सामंजस्य ने लोगों के दिलों में मिथूबेन पेटिट को ”माईजी“ बना दिया था।
कस्तूरबा वणतशाला(कस्तूरबा बुनाई शाला) के आर्थिक कमी के समस्या को दूर करने के लिए मिथूबेन ने गांधीजी से पूछा- क्या आश्रम में हो रहे धनाभाव की पूर्ति के लिए वे उन्हें सिनेमा या नाटक शो आयोजित करने की अनुमति दे सकते है।
गांधीजी को उनके प्रश्न से आघात लगा और उन्होंने मिथूबेन से कहा- साधन साध्यों के बराबर महत्वपूर्ण होते हैं। यदि उनका कार्य अच्छा है तो धन के अभाव में कारण उसमें बाधा नहीं पड़ेगी। परंतु, अपने साध्यों को महत्वपूर्ण सिद्ध करने की धुन में उन्हें साधनों के मामले में कभी समझौता नहीं करना चाहिए।
उसके बाद मिथूबेन ने कोष संग्रह के लिए उस प्रकार के साधनों का सहारा लेने की बात कभी नहीं सोची। कुछ समय पश्वात गांधीजी ने उनको आर्थिक सहायता भेजवायी और मिथूबेन की गतिविधियों में तीव्रता से प्रगति हुई।[iii]
नि: स्वार्थ सेवा के 43 वर्षो में मिथूबेन अपने सिद्धांतों से कभी नहीं डिगीं। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गांधीजी के कार्यक्रम को समर्पित करके उसे कार्यरूप मे बदल दिया।
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[i] उषा एच. गोर्कोनी, मिथूबेन पेटिट, भारतीय पुर्नजागरण में महिलाएं सं. सुशीला नैयर. कमला मनेकेकर, नेशनल ट्रस्ट, इंडिय पेज न०- 189
[ii] वही पेज न०- 190
[iii] वही पेन न०- 193

जे एन यू से मीडिया एंड जेंडर पर पीएचडी। दो बार लाडली मीडिया अवार्ड। स्वतंत्र लेखन।
संपादक- द क्रेडिबल हिस्ट्री

गांधी पर बात करते हुए दो गलत रास्ते पकड़ना सबसे आसान है। एक भक्ति, दूसरा निंदा। मैं सोचती हूँ कि महात्मा की पदवी उन्हें भली ही लगती होगी। उसका जो दबाव बाकियों पर था उससे ज़्यादा गांधी पर खुद रहा होगा। दक्षिण अफ्रीका में मिली प्रसिद्धि के बाद जब वे भारत आए तो एक देशव्यापी असहयोग आंदोलन चला पाना उनकी पहली बड़ी सफलता थी।
एक ऐसा काम था यह जिसके बारे में उस वक़्त ज़्यादातर प्रभावशाली लोग शंका में थे। यह व्याव्हारिक भी है या नहीं? यही गांधी की सबसे बड़ी ताकत बनी। अव्यावहारिक को व्यावहारिक बना देना। लोगों को अपने साथ ले आना। उन्हें नेतृत्व देना। उन्हें वह रास्ता दिखाना जो सत्ता के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष के लिए शायद सबसे उपयुक्त था उस वक़्त। अहिंसा और सत्याग्रह। आपको पता है कि आपके पास ताकत नहीं है, ऐसे में सत्ताधारियों के भीतर वह उदारता और करुणा जगाना कि वह अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करे इसके लिए सत्याग्रह और अहिंसा औजार भी थे, कवच भी।
लेकिन गांधी आजीवन खूब आलोचनाओं के शिकार हुए। चिट्ठियों में उन्हें लोग जी भरकर गालियाँ देते थे। वे कहते थे गाली और प्रशंसा मेरे लिए एक ही है। मैं इसे समझ सकती हूँ। जब आपका उद्देश्य विराट होता है तब निंदा-प्रशंसा एक ही हो जाती है। बहुत फर्क नहीं पड़ता इस बात से कि उनके किसी कदम पर भक्त या निंदक क्या कह रहे हैं। इसी स्थितप्रज्ञता और महानता के आस-पास कहीं एक तानाशाह मन होता है जिसे बरजते रहना, परखते रहना चाहिए। इस मुद्दे पर आगे बाते करूंगी ही।
इस घपले की शुरुआत में मैं उस बोदे आदमी को देखना चाहती हूँ जो अपनी असफलताओं से घबराया हुआ था, सबके सामने बोलने से डरता था, जैसा कि हममे से कोई भी हो सकता था, और है। कमज़ोर और भगौड़े जैसे! अब तक उसके संघर्ष निजी थे।
चोरी करके, माँसाहार करके,सिगरेट पीकर उसने अंतत: पिता को सब चिट्ठी में लिख दिया और रोकर अपनी आत्मा को पवित्र पाया। दक्षिण अफ्रीका में पहली बार इस अच्छे मारवाड़ी परिवार के लड़के को यह समझ आया कि सामूहिक अस्मिता के सवालों से जूझे बिना वैयक्तिक संघर्षों का इतिहास की नज़र में कोई मोल नहीं है।
आगे के सारे प्रयोगों के बीज यहीं पड़े थे। उसने अपनी कमज़ोरियों पर विजय पाने के लिए एक कठिन और निराली राह चुनी। यह राह थी- ज़िद ! न टूटने वाली ज़िद। सविनय अवज्ञा। पहले दर्जे का टिकट लेकर तीसरे दर्जे में नहीं बैठूंगा भले ट्रेन से बाहर फेंक दिया जाए।
स्टेशन पर रात गुज़ारनी पड़े।वे पलट के घूसा भी मार सकते थे। अदालत में मैं अपनी पगड़ी नहीं उतारूंगा। यह ज़िद गांधी के बहुत काम आई आगे और उनके परिवार की पीड़ा भी बनी।

दक्षिण अफ्रीका ने यह तय कर दिया था कि गांधी का जीवन अब सार्वजनिक जीवन ही हो सकता है। वे अकेले में, पत्नी-बच्चों के साथ अपने छोटे से संसार में खुश रह सकने वाले जीव नहीं थे। सार्वजनिक जीवन में उन्हें अपनी उपादेयता महसूस हुई तो यह एक लत बन गई। दक्षिण अफ्रीका में ही अहिंसा और सत्याग्रह जैसे महत्वपूर्ण औजार उनके हाथ लग चुके थे जिनके साथ और प्रयोग हिंदुस्तान में अभी किए जाने थे। यहाँ मज़ेदार यह है, और जिस मुख्य बिंदु पर मुझे आना ही है, ये दोनो औजार उन्होने स्त्रियों से प्राप्त किए थे। इसमें संदेह नहीं। अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं से उलझते हुए उनके लिए कस्तूरबा से निबटना आसान नहीं था। कस्तूरबा की हठ, असहयोग, सहनशीलता और उत्सर्ग उनके लिए एक पथ-प्रदर्शक बने। साथ ही काली औरतों का उनपर गहरा असर हुआ। स्त्रियों के भीतर अहिंसात्मक तरीकों से लड़ने और बात मनवाने, सहते जाने और त्याग करने की अदम्य क्षमता के विविध प्रयोग अभी हिंदुस्तान में किए जाने थे।
मेरी नज़र में इसका सबसे सुन्दर प्रयोग साम्प्रदायिकता के मुद्दों से निपटने में गांधी ने किया। नोआखली में जो हुआ उसे कोई गांधी ही सम्भव कर सकता था। इससे ज़्यादा दुख की बात क्या हो सकती है कि एक व्यक्ति जो हिंदुओं से मुसलमानों का पक्ष लेने के लिए और मुसलमानों से हिंदुओं का पक्ष लेने के लिए आजीवन गाली खाता रहा वह आज फिर से गालियाँ खा रहा है।
यह कोई नई बात नहीं थी।
उन्नीसवीं सदी के समाज-सुधारकों को पढते हुए मैंने यही महसूस किया कि स्त्रियों को लेकर उनकी सोच में कोई नई बात, कोई क्रांतिकारिता नहीं थी। अपनी किताब ‘इण्डियन विमेन’ में गेराल्डाइन फोर्ब्स लिखती हैं कि यूरोप की नज़र में भारत एक अत्यंत पिछ्ड़ा हुआ देश था क्योंकि यहाँ की स्त्रियों की दुर्दशा जैसी दुनिया में कहीं नहीं थी। बाल-विवाह, सती-प्रथा, जहालत, अशिक्षा, अंध-विश्वास, ऊंची मृत्यु-दर, विधवाओं की स्थिति तो अत्यंत शोचनीय थी। ऐसे में सुधारकों को अपने राष्ट्र की छवि सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी लगा कि स्त्रियों को इस नरक से निकाला जाए। लेकिन इन सब सुधारों का अंतिम लक्ष्य एक अच्छी, कुशल, शिक्षित, संस्कारित गृहिणी बनाना ही था। संरचना से टकराने का काम तो औरतों को खुद ही करना था। ज्योतिबा और सावित्री बाई, पंडिता रमाबाई ने यह काम किया भी। लेकिन यह और मज़ेदार है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में राष्ट्रीय आंदोलन से रमाबाई की आवाज़ गायब कर दी गई। 1922 तक उनके जीवित रहने के बावजूद। महज़ इसलिए कि वे हर स्तर पर संरचना से टकरा रही थीं। संरचना, जो पितृसत्तात्मक ही नहीं थी हिंदू भी थी और रमाबाई दलित से विवाह करके ईसाई हो चुकी थीं।
सबको साथ लेकर चलना गांधी की वह खूबी थी और राष्ट्रीय आंदोलन की विवशता भी कि वे स्त्रियों के लिए कोई क्रांतिकारी ज़मीन तैयार करके अपनी ताकत को कमज़ोर नहीं करा सकते थे। स्त्रियों को अपनी अस्मिता के प्रति सचेत होने देने का मामला बड़ा नाज़ुक मामला था। इससे बड़ा लक्ष्य गांधी के सामने था। मुझे दूधनाथ सिंह की कहानी ‘माई का शोकगीत’ याद आती है। गांधी जी के आंदोलन में जी-जान से लगी माई जब एक दिन अपने गाँव की स्त्री को घर में पिटता देखती हैं तो बापू को चिट्ठी लिखती हैं – देश के गोरे राचछ्सों से आप लड़िए, मेरे लिए गाँव में ही बहुत काम है, यहाँ तो घर-घर में गोरे राच्छस भरे पड़े हैं।
तो गाँधी ने भारत की स्त्रियों के भीतर आत्मोत्सर्ग और सहनशीलता की भावना को चुनौती दी, और बावजूद इसके कि गांधी के भारत आने से पूर्व ही स्त्रियाँ सार्वजनिक जीवन और कामों में आ चुकी थी, उन्होंने स्त्रियों के बाहर निकलने के कारणों को वैधता दी और बड़ी संख्या में उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के हिरावल दस्ते में शामिल कर लिया। वे लिखते हैं –“भारत में स्त्रियों ने पर्दे को फाड़ फेंका और राष्ट्र के लिए काम करने को आगे आई। उन्होंने देखा कि राष्ट्र उनसे महज़ घर की देखभाल के अलावा भी कुछ और चाहता है” इस तरह वे मामूली स्त्रियाँ भी जो सदियों के शोषण और गुलामी की वजह से आत्म-सम्मान खो बैठी थीं उनमें एक गर्व का भाव भरा। देश के लिए उनका होना भी मानी रखता है !
लेकिन स्त्रियों के साथ इस प्रयोग में कई सीमाएँ थीं। विचारों और कर्मों से जो पवित्र हैं वे स्त्रियाँ ही उनके अभियान का हिस्सा हो सकती थीं। स्त्रियों के साथ इस पवित्रता को जोड़ना एक हिंदू सवर्ण की नैतिकता के अलावा क्या था कि 1925 में बंगाल कॉन्ग्रेस द्वारा वेश्याओं को संगठित करने को लेकर वे उखड़ गए ? राधा कुमार अपनी किताब ‘हिस्टरी ऑफ डूइंग’ में इस पर विस्तार से बात करती हैं।

गाँधी स्त्री होना चाहते थे। वे चाहते थे आश्रम के लोग उन्हें बाप नहीं माँ मानें। मनु गाँधी ने उन्हें माँ ही कहा है। एक तरह से यह प्रयोग था।
वे मानते थे कि साधना से पुरुष स्त्रियों के गुण पा सकते हैं। अपने एक सहयोगी कृष्ण्चंद्र को एक पत्र में वे लिखते हैं- ‘the idea is that a man, by becoming passionless, transforms himself into a woman, that is, he includes woman into himself’ स्त्रैण और परुष विशेषताओं का आना-जाना लगे रहना और दुनिया के तमाम लोगों में स्त्रैण-परुष का समान बँटवारा होना एक बराबरी का समाज बनाएगा। लेकिन यहाँ कुछ अलग बात है।
- यहाँ दो बातें अजीब हैं। हम सब उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के वाकिफ़ हैं। लेकिन पहली बात, ‘पैशनलेसनेस’ से स्त्रीत्व को व्याख्यायित करना दिक्कततलब है।
अपनी किताब ‘द फीमेल यूनक’ में जर्मेन ग्रीयर उसी प्रक्रिया को खोलकर बताती हैं जिसके ज़रिए स्त्री को बधिया बनाया जाता है, आवेगहीन, शमित किया जाता है और फिर मूल्य की तरह यह उसके चरित्र के साथ नत्थी कर दिया जाता है।
- दूसरी बात, दोषहीन, निष्कलंक ब्रह्मचारियों (यानी जो मात्र संतानोतपत्ति के लिए संसर्ग करें) का समाज बनाने का मकसद क्या हो सकता है? हम जानते हैं कि गाँधी का सारा संघर्ष अपनी कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ने से शुरु होता है। यह संघर्ष बड़ा होता जाता है तो समस्त नैसर्गिक मानवीय प्रकृति के खिलाफ एक युद्ध में तब्दील हो जाता है।
भोजन के साथ किए प्रयोग, इलाज के तरीकों में उनके प्रयोग और ब्रह्मचर्य ! सभी में एक सी हठ कि मेरा रास्ता सही है। स्त्री-यौनिकता से यह भय पूरी दुनिया की भिन्न संस्कृतियों का जैसे ज़रूरी हिस्सा है। अकेले में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन आसान है। लेकिन स्त्री के करीब रहकर उसके कामुक प्रभाव से बच निकलना सच्चा संत ही कर सकता है।
सबरीमाला के भगवान तक स्त्री की उपस्थिति से आक्रांत हैं। माया महाठगिनी, पाप का द्वार,नर्क का द्वार। ऐसे में उसे खुद भी पवित्र रहना चाहिए और पुरुष को भी रहने देना चाहिए। संसार की सेवा के लिए अविवाहित स्त्री जो ब्रह्मचर्य का पालन करती है उससे बेहतर कोई भी नहीं।
पिता को चिट्ठी लिखकर मोहनदास इतना तो जान गए थे कि जो बात छुपाई जाती है वह पाप है। छिपाने का अपराध-बोध आपको पवित्र नहीं रहने देगा। इसलिए ब्रह्मचर्य के सभी प्रयोगों पर उन्होंने स्वयम बात की। यह साहस श्लाघनीय है। हमारे बीच में से कितने पुरुष स्वीकार कर सकते हैं कि बसों, सार्वजनिक जगहों पर स्त्रियों के बीच वे क्या-क्या महसूस करते रहे? उनके और प्रेमा कण्टक या बाकी के सहयोगियों के बीच का पत्राचार इस साहस का प्रमाण है।
लेकिन जितना गांधी अपने अनुभवों की कहते हैं उन स्त्री-सहयोगियों की भावनाओं की एकदम नहीं बताते जो इन प्रयोगों में साथ थीं। उनका मह्ज़ गिनी पिग बना दिया जाना अक्षम्य है। आश्रम की तमाम स्त्री-सहयोगियों के बीच ईर्ष्या के कई सबूत मिलते हैं। तमाम आलोचनाओं के बाद भी गांधी कहते हैं कि उनकी सहयोगियों की सहमति है तो फिर बाकियों को क्या दिक्कत है?
यहाँ सुचेता कृपलानी के प्रेम विवाह की बात याद करनी चाहिए। गाँधी प्रेम विवाह और अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ थे। शायद पूछा भी किसी ने कि जब दो लोग राज़ी हैं तो बाकियों को दिक्कत क्यों? इन तमाम वैचारिक विरोधाभासों पर बात करने से नीलिमा डालमिया तक बच निकलीं हैं जिन्होंने अपनी किताब ‘कस्तूरबा की रहस्यमय डायरी’ में तथ्यों के आधारपर कस्तूरबाई की दृष्टि से एक फिक्शनल किताब लिखी है।
स्त्री को माता बनाया गया और माता को पीड़िता। भारत माता का बिम्ब भी यही था। सरोजिनी नायडू अपने एक भाषण में देश के मर्दों को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि पालना झुलाने वाले हाथों ने आज आज़ादी की मशाल थाम ली है, अब तो शर्म करो भाइयों !
कुल मिलाकर गाँधीवादी आंदोलन में स्त्रियों की हर तरह की हिस्सेदारी ने उन्हें इस तरह भ्रमित किया कि उन्हें अपना असल शत्रु- पितृसत्ता नज़र ही नहीं आई।
वे तो एक पवित्र उद्देश्य में अपने भाइयों, पतियों, पिताओं का साथ देने के लिए पर्दे को फेंककर दुर्गा और काली बन सामने आ गई थीं। सबसे पहला झटका उन्हें तब लगा जब ‘हिंदू कोड बिल’ के समर्थन में वही हिंदू पुरुष खड़े मिले जिनके कंधे से कंधा मिलाकर वे आज़ादी के लिए प्राणोत्सर्ग करने निकली थीं।
यह भ्रमावस्था लम्बी चलती है। लगभग 1970 तक। यही हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप था। आज हम देखते हैं कि उन्नीसवीं सदी के तमाम सुधारकों और राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेताओं गोखले, तिलक, पटेल, जस्टिस रानाडे जैसे तमाम लोगों की धरोहर हिंदू राष्ट्र बनाने के काम आ रही है।
एक बात साफ है कि गहरे अध्ययन के बिना इस व्यक्ति के बारे में कुछ भी ठसक से कहना निरी मूर्खता है और तमाम अध्ययन के बाद भी इसके बारे में बिना एक पक्ष पकड़े कुछ कहना मुश्किल है।
इतना ज़रूर है कि निजी और सार्वजनिक का भेद जिस तरह यह अपने जीवन में मिटा पाया वह असाधारण है। यह भी कि उसकी क़ीमत आप कभी अकेले नहीं चुकाते। गाँधी ने भी अकेले नहीं चुकाई गाँधी होने की क़ीमत। यह कोलेटरल डैमेज सम्भवतः सबसे ज़्यादा स्त्रियों के पल्ले पड़ा।
असल समस्या अब यह है कि सावरकर और गोडसे जैसों की मौजूदगी की क़ीमत चुकाना एक समाज को इतना भारी और महँगा पड़ता है कि पूरे इतिहास में गाँधी को एक ही बार पाया जा सकता था।
अब, सबको साथ लेकर चलने वाला भी गाँधी नहीं हो सकता, लेकिन गाँधी के रास्ते से गुज़रे बिना यह संभव भी नहीं।
दरअसल, मौलिकता के बिना कोई पीढ़ी अपने युद्ध नहीं जीत सकती। सत्य के साथ उसे अपने प्रयोग करने होंगे।

सुजाता दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं। कवि, उपन्यासकार और आलोचक। ‘आलोचना का स्त्री पक्ष’ के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। हाल ही में लिखी पंडिता रमाबाई की जीवनी, ‘विकल विद्रोहिणी पंडिता रमाबाई’ खूब चर्चा में है।