जवाहरलाल नेहरू एक साथ तीन असाधारण युगों से आते थे। उन्होंने अपने देश के उपनिवेशवाद-विरोधी लम्बे संघर्ष में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी, दूसरे देशों में ऐसी संघर्ष चेतना को प्रेरित भी किया। उन्होंने विजय हासिल की, और फिर एक दूसरे युग के संघर्ष में जुट गए- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शान्ति की स्थापना । इस चरम संघर्ष में गांधी उनके साथ नहीं थे, लेकिन महान स्वतंत्र गणतंत्र भारत की जनता उनके साथ थी।
इस पूरे कालखंड में नेहरू और भारत के योगदान का पूरा मूल्यांकन कर पाना बहुत कठिन है। यह वो दौर था जब मानव जाति एक भयंकर अन्त के एक सतत ख़तरे से गुज़र रही थी। इस दौर में, एक भी क्षण ऐसा नहीं था जब परमाणु युद्ध की आशंका न बनी रही हो। ऐसे वक़्त में नेहरू एक कद्दावर वैश्विक शक्ति के रूप में, पूरब और पश्चिम की महान ताक़तों की आपसी शत्रुताओं के बीच, भारत की शान्ति सम्मति को स्थापित कर रहे थे।
दुनिया को एक ऐसे मध्यस्थ और ‘ईमानदार बिचौलिए’ की ज़रूरत थी, अन्यथा उसने अचानक जो विनाश की ताक़त हासिल कर ली थी, उसमें कोई भी पक्ष दुनिया को मानव जाति के अन्तिम युद्ध में डुबो सकता था। नेहरू में वो प्रतिष्ठा, बुद्धिमत्ता और साहस था कि वो इस भूमिका को निभा सकें। आज जो तनाव में कमी दिखती है, वो नेहरू की विरासत भी है, उनकी यादगार भी।
पूर्व और पश्चिम के विचारों का संगम थे पंडित नेहरू — फ्रैंक मोरैस
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1963 में हुई परमाणु परीक्षण निरोधक सन्धि का प्रस्ताव सबसे पहले नेहरू ने ही रखा था। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उपनिवेशवाद जिस तेजी से पूरी दुनिया से अपने पैर समेट रहा है, उसकी मूल जड़ भारत की विशाल जीत में छिपी थी। और यह भी याद रखना चाहिए कि नेहरू उस ‘एशियन अफ्रीकन ब्लाक’ को करोड़ों लोगों की एक संयुक्त आवाज़ बनाने में मार्गदर्शक बने जो आधुनिक विश्व बनने की ओर केवल अनुमान से बढ़ रहे थे। गुटनिरपेक्षता या तटस्थता के नीति-निर्माता थे जो कि नये उभरते राष्ट्रों को अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति देने के लिए बनाई गई थी, जिससे वह वैश्विक मुद्दों पर वह अपनी रचनात्मक भूमिका भी निभा सके।
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नेहरू का तीसरा युग उनकी मृत्यु के बाद सामने आ रहा है। भले वह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति एक जीवनी शक्ति के रूप में अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। आज भी महान शक्तियों के आपस में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं हैं, फिर भी गुटनिरपेक्ष संसार की मदद से इन शक्तियों ने परस्पर समझदारी-भरा नियंत्रण बनाना सीखा है। इसमें एक स्थायी शान्ति का आधार छुपा है। इसके आगे भी, शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व पर भरोसा रखने और उसके लिए काम भी कर सकने का जो उदाहरण नेहरू के रूप में हमारे पास है, उसने मानवता को एक उम्मीद-भरी आशा दी है।
इस काल में मेरे लोगों, यूनाइटेड स्टेट्स के नीग्रो’ लोगों, ने सभी पुरानी नज़ीरों का अतिक्रमण करके आज़ादी की ओर क़दम बढ़ाया है। हमारी सफलता का श्रेय उन अहिंसात्मक सीधी कार्यवाहियों और बुराई के साथ असहयोग की युक्तियों को जिन्हें गांधी की प्रेरणा से नेहरू ने असरदार ढंग से लागू किया।यह साम्राज्यवाद की कुटिलता थी कि उसने बड़ी आसानी से दुनिया को इस भ्रम में उलझाए रखा कि वो आदिम सभ्यताओं को सभ्य बना रही है जबकि वो पूरी तरह से उनका शोषण कर रहे थे।
सत्याग्रह ने इस मिथक को तोड़ दिया और उसने खुलासा कर दिया कि जो लोग अत्याचार के शिकार थे, वास्तव में पूरी तरह से सभ्य तो वही थे। उन्होंने हिंसा को ख़ारिज किया और प्रतिरोध करते रहे, जबकि अत्याचारी को हिंसा के प्रयोग के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही पता नहीं था।
हमारे लोगों ने भी यूनाइटेड स्टेट्स में उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ इसी सत्याग्रह की नीति अपनाई जिससे ये साफ़ हो गया कि कौन सही था और कौन ग़लत। सत्य की इसी अपराजेय नींव पर बहुसंख्यक जनता एक न्यायसंगत समाधान के लिए संगठित हो सकी।
अभी हमने पूरी जीत नहीं हासिल की है, क्योंकि उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष अभी जारी है, और सबसे ज़रूरी यह कि एक स्थायी शान्ति की सफलता अभी हमसे दूर है। एक सच्ची सभ्यता के लिए मानव जाति द्वारा किए जा रहे इन सारे संघर्षों में, संवादों में हर जगह नेहरू की ऊँची शख़्सियत मौजूद है, भले ही भौतिक रूप से वे अब दुनिया में न हों। उनकी कमी पूरी दुनिया को खलती है, कितने सारे लोग सोचते हैं कि काश, नेहरू हमारे साथ होते… इसीलिए, आज इस बेचैन दुनिया में नेहरू अभी भी हमारे साथ हैं।

पुरुषोत्तम अग्रवाल, कौन हैं भारत माता?, राजकमल प्रकाशन
पंडित नेहरू महात्मा गांधी की ओर क्यों आकर्षित हुए? इसका मुख्य कारण गांधीजी का विद्रोही स्वरूप था। गांधीजी अन्याय और क्रूरता के विरुद्ध थे और ऊँचे सिद्धांतों में विश्वास करने के बजाय, उन्हें जीवन में अपनाने पर जोर देते थे। पंडित नेहरू और गांधीजी दोनों स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं मानते थे; वे इसे जनता की सामाजिक और आर्थिक उन्नति के साथ जोड़कर देखते थे। पंडित नेहरू के अनुसार, राजनीतिक दासता से मुक्ति के साथ-साथ मानसिक दासता से मुक्ति भी आवश्यक थी।
स्वतंत्रता की इस विचारधारा ने पंडित नेहरू को उस समय गहराई से प्रभावित किया जब 1920 की गर्मियों में उन्होंने पहली बार भारत के गरीब और भूखे किसान को करीब से देखा। इलाहाबाद में जब कुछ किसान पहुंचे, तो पंडित नेहरू ने उनके शिविर का दौरा किया। वहाँ की परिस्थितियाँ देखकर वे भीतर तक हिल गए। इसके बाद, पंडित नेहरू ने भारत को दलित और गरीब किसानों के रूप में देखना शुरू किया। गांधीजी के साथ इस दृष्टिकोण पर चर्चा के दौरान उनके बीच मतभेद भी उभरे। गांधीजी ने धार्मिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया, जबकि पंडित नेहरू को उनके कुछ विचार मध्ययुगीन और अव्यावहारिक लगे।
पंडित नेहरू और गांधीजी के विचारों में वर्षों तक अद्भुत साम्य रहा। हालाँकि समय-समय पर पंडित नेहरू ने अपने कार्य को गांधीजी की नीतियों के अनुरूप ढाला, लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। 1927 से 1947 तक पंडित नेहरू ने उन्हीं विचारों का प्रचार-प्रसार किया जिन्हें वे कार्यरूप में लाना चाहते थे। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका मानना था कि केवल राष्ट्रवाद पर्याप्त नहीं है; भारत को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की व्यापक परिप्रेक्ष्य में अपनी स्थिति का आकलन करना चाहिए।
पंडित नेहरू की खासियत यह थी कि उन्होंने गांधीजी के विचारों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर मध्यवर्गीय बौद्धिक वर्ग को गांधीजी के ध्वज तले संगठित किया। हालाँकि, वे मशीनों और आधुनिक सभ्यता पर गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं थे। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन के धार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर गांधीजी के जोर से भी प्रसन्न नहीं थे। गरीबी और कष्टपूर्ण जीवन के महात्मा गांधी के आदर्शीकरण पर भी उन्हें आपत्ति थी।

1920 के दशक के अंत तक पंडित नेहरू का समाजवाद अधिक ठोस रूप ले चुका था। मार्च 1926 में वे अपनी पत्नी कमला और नौ वर्षीय पुत्री इंदिरा के साथ यूरोप गए, जहाँ उन्होंने 21 महीने बिताए।
इस यात्रा ने उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ लाया और भारतीय राष्ट्रवाद में अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण जोड़ा। उनका मानना था कि भारत को अलग-थलग नहीं देखा जा सकता; वह विश्व समाज का एक अभिन्न अंग है। स्वतंत्रता के बाद, यही दृष्टिकोण उनकी विदेश नीति का आधार बना।
यूरोप यात्रा ने पंडित नेहरू की इस सोच को मजबूत किया कि भारत का स्वतंत्रता संघर्ष अंतरराष्ट्रीय महत्व रखता है। बाद में, भारत की स्वतंत्रता ने एशिया और विश्व में स्वतंत्रता का प्रतीक बना दिया। पंडित नेहरू का विश्वास था कि भारत की प्रगति को विश्व प्रगति से जोड़ा जाना चाहिए। उनकी विदेश नीति में उपनिवेशवाद का विरोध और गुटनिरपेक्षता की भावना इसी सोच का परिणाम थी।
पंडित नेहरू की विचारधारा के परिपक्व होने में 1926 और 1938 की यूरोप यात्राओं का विशेष महत्व रहा। पहली यात्रा के दौरान वे सिद्धांतवादी समाजवादी थे, जो स्वतंत्रता को तभी सार्थक मानते थे जब सामाजिक और आर्थिक उन्नति हो। हालांकि, उस समय उनके पास भारत के आर्थिक पुनरुत्थान के लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं थी। 1930 के दशक में जेल में बिताए गए समय ने उन्हें समाजवादी और मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन करने का अवसर दिया, जिससे स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के बारे में उनके विचार विकसित हुए।
1938 में यूरोप यात्रा के दौरान उनके विचार पहले से अधिक स्पष्ट और परिपक्व हो चुके थे। इस समय उनके अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में उपनिवेशवाद का विरोध तो था, परंतु गुटनिरपेक्षता का पुट इसमें नहीं था।
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1931 में कराची में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पंडित नेहरू ने एक नीतिगत प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रमुख उद्योगों और सेवाओं के राष्ट्रीयकरण की वकालत की गई थी।
इसके पहले 1929 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने एक ठोस समाजवादी कार्यक्रम अपनाने की सिफारिश की थी। पंडित नेहरू ने एक ऐसे समाजवादी भारत का सपना देखा जो सामंती तत्वों और राजशाही के अत्याचारों से मुक्त हो। इस दृष्टिकोण की औपचारिक रूपरेखा 20 साल बाद कांग्रेस के अधिवेशन में प्रस्तुत की गई।
पंडित नेहरू सिद्धांत एक ऐसी नीति और विचारधारा थी जो उपनिवेशवाद से मुक्त हुए नए देशों के लिए बनाई गई थी। भारत ने एक ऐसा मंच प्रदान किया जिससे पश्चिम अपनी साम्राज्यवादी दृष्टि का समायोजन कर सकता था। पंडित नेहरू सिद्धांत ने प्रभुसत्तात्मक समता की संकल्पना को कानूनी दर्जा प्रदान किया, जिसे नवस्वाधीन देशों पर लागू किया गया। इसके मुख्य घटक गुटनिरपेक्षता और पंचशील के पांच सिद्धांत थे। पंडित नेहरू ने भारतीय जनमानस में एक नई मानसिकता को जन्म दिया और देश के मानसिक एवं सामाजिक वातावरण को बदला। उन्होंने लोगों को लोकतंत्र का आदर करना सिखाया और उनका दुरुपयोग नहीं किया।
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यदि पंडित नेहरू न होते, तो भारत का रूप कुछ और होता। पंडित नेहरू ने भारत को एक नया दृष्टिकोण और उद्देश्य दिया और जनता को अपने सपनों का भारत बनाने के लिए प्रेरित किया। अन्य महापुरुषों की तरह पंडित नेहरू में भी मानवीय कमियाँ थीं, लेकिन उनके पास सुधार की शक्ति थी, और उनकी गलतियों को आवश्यकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।
पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत ने स्वतंत्रता का एक नया रूप देखा, जिसने लगभग एक हजार वर्षों बाद आधुनिक दुनिया में स्वाधीनता का अनुभव किया। उनकी लोकप्रियता का राज उनका स्वच्छ हृदय और निःस्वार्थ दृष्टिकोण था।
पंडित नेहरू एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे, जिन्होंने पूर्व और पश्चिम के विचारों का संगम प्रस्तुत किया। विश्व उनके योगदान को चिरकाल तक स्मरण करेगा, क्योंकि उन्होंने भारत के हितों को सदैव प्राथमिकता दी और अपने असफलताओं के बावजूद देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी।