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सत्याग्रह – The Credible History https://thecrediblehistory.com People’s history in people’s language Fri, 15 Nov 2024 13:58:15 +0000 en-US hourly 1 https://thecrediblehistory.com/wp-uploads/2023/05/cropped-cropped-LogoTCH-32x32.png सत्याग्रह – The Credible History https://thecrediblehistory.com 32 32 अमन के संघर्ष में नेहरु हमारे साथ है -मार्टिन लूथर किंग जूनियर https://thecrediblehistory.com/2024/11/still-with-us-in-the-struggle-for-peace-martin-luther-king-jr/ https://thecrediblehistory.com/2024/11/still-with-us-in-the-struggle-for-peace-martin-luther-king-jr/#respond Thu, 14 Nov 2024 06:54:58 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=9309 मार्टिन लूथर किंग, जूनियर (1929-1968) अमेरिका में नागरिक आन्दोलन और सिविल नाफ़रमानी की गांधीयन विधियों को अपने आन्दोलन का (1955 से 1968 में अपनी हत्या तक) के सबसे बड़े प्रवक्ता थे। वह अहिंसा आधार बनाने के लिए विख्यात हैं। वह नेहरू के भी प्रशंसक थे, और उन्हें अश्वेत अमेरिकियों को अलग-थलग रखने की नीतियों के विरुद्ध संघर्ष के प्रेरणास्त्रोतों में गिनते थे। दोनों के बीच में संक्षिप्त पत्राचार भी हुए और 1959 में दिल्ली में एक मुलाक़ात भी, जिसमें दोनों नेताओं ने बहुत-सी राजनीतिक और सामाजिक चिन्ताएँ एक-दूसरे से साझा कीं।

नेहरू  के योगदान का पूरा मूल्यांकन कर पाना बहुत कठिन है

जवाहरलाल नेहरू एक साथ तीन असाधारण युगों से आते थे। उन्होंने अपने देश के उपनिवेशवाद-विरोधी लम्बे संघर्ष में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी, दूसरे देशों में ऐसी संघर्ष चेतना को प्रेरित भी किया। उन्होंने विजय हासिल की, और फिर एक दूसरे युग के संघर्ष में जुट गए- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शान्ति की स्थापना । इस चरम संघर्ष में गांधी उनके साथ नहीं थे, लेकिन महान स्वतंत्र गणतंत्र भारत की जनता उनके साथ थी।

इस पूरे कालखंड में नेहरू और भारत के योगदान का पूरा मूल्यांकन कर पाना बहुत कठिन है। यह वो दौर था जब मानव जाति एक भयंकर अन्त के एक सतत ख़तरे से गुज़र रही थी। इस दौर में, एक भी क्षण ऐसा नहीं था जब परमाणु युद्ध की आशंका न बनी रही हो। ऐसे वक़्त में नेहरू एक कद्दावर वैश्विक शक्ति के रूप में, पूरब और पश्चिम की महान ताक़तों की आपसी शत्रुताओं के बीच, भारत की शान्ति सम्मति को स्थापित कर रहे थे।

दुनिया को एक ऐसे मध्यस्थ और ‘ईमानदार बिचौलिए’ की ज़रूरत थी, अन्यथा उसने अचानक जो विनाश की ताक़त हासिल कर ली थी, उसमें कोई भी पक्ष दुनिया को मानव जाति के अन्तिम युद्ध में डुबो सकता था। नेहरू में वो प्रतिष्ठा, बुद्धिमत्ता और साहस था कि वो इस भूमिका को निभा सकें। आज जो तनाव में कमी दिखती है, वो नेहरू की विरासत भी है, उनकी यादगार भी।


पूर्व और पश्चिम के विचारों का संगम थे पंडित नेहरू — फ्रैंक मोरैस


हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1963 में हुई परमाणु परीक्षण निरोधक सन्धि का प्रस्ताव सबसे पहले नेहरू ने ही रखा था। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उपनिवेशवाद जिस तेजी से पूरी दुनिया से अपने पैर समेट रहा है, उसकी मूल जड़ भारत की विशाल जीत में छिपी थी। और यह भी याद रखना चाहिए कि नेहरू उस ‘एशियन अफ्रीकन ब्लाक’ को करोड़ों लोगों की एक संयुक्त आवाज़ बनाने में मार्गदर्शक बने जो आधुनिक विश्व बनने की ओर केवल अनुमान से बढ़ रहे थे। गुटनिरपेक्षता या तटस्थता के नीति-निर्माता थे जो कि नये उभरते राष्ट्रों को अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति देने के लिए बनाई गई थी, जिससे वह वैश्विक मुद्दों पर वह अपनी रचनात्मक भूमिका भी निभा सके।


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नेहरू का तीसरा युग उनकी मृत्यु के बाद सामने आ रहा है

नेहरू का तीसरा युग उनकी मृत्यु के बाद सामने आ रहा है। भले वह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति एक जीवनी शक्ति के रूप में अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। आज भी महान शक्तियों के आपस में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं हैं, फिर भी गुटनिरपेक्ष संसार की मदद से इन शक्तियों ने परस्पर समझदारी-भरा नियंत्रण बनाना सीखा है। इसमें एक स्थायी शान्ति का आधार छुपा है। इसके आगे भी, शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व पर भरोसा रखने और उसके लिए काम भी कर सकने का जो उदाहरण नेहरू के रूप में हमारे पास है, उसने मानवता को एक उम्मीद-भरी आशा दी है।

इस काल में मेरे लोगों, यूनाइटेड स्टेट्स के नीग्रो’ लोगों, ने सभी पुरानी नज़ीरों का अतिक्रमण करके आज़ादी की ओर क़दम बढ़ाया है। हमारी सफलता का श्रेय उन अहिंसात्मक सीधी कार्यवाहियों और बुराई के साथ असहयोग की युक्तियों को जिन्हें गांधी की प्रेरणा से नेहरू ने असरदार ढंग से लागू किया।यह साम्राज्यवाद की कुटिलता थी कि उसने बड़ी आसानी से दुनिया को इस भ्रम में उलझाए रखा कि वो आदिम सभ्यताओं को सभ्य बना रही है जबकि वो पूरी तरह से उनका शोषण कर रहे थे।

सत्याग्रह ने इस मिथक को तोड़ दिया और उसने खुलासा कर दिया कि जो लोग अत्याचार के शिकार थे, वास्तव में पूरी तरह से सभ्य तो वही थे। उन्होंने हिंसा को ख़ारिज किया और प्रतिरोध करते रहे, जबकि अत्याचारी को हिंसा के प्रयोग के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही पता नहीं था।

हमारे लोगों ने भी यूनाइटेड स्टेट्स में उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ इसी सत्याग्रह की नीति अपनाई जिससे ये साफ़ हो गया कि कौन सही था और कौन ग़लत। सत्य की इसी अपराजेय नींव पर बहुसंख्यक जनता एक न्यायसंगत समाधान के लिए संगठित हो सकी।

अभी हमने पूरी जीत नहीं हासिल की है, क्योंकि उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष अभी जारी है, और सबसे ज़रूरी यह कि एक स्थायी शान्ति की सफलता अभी हमसे दूर है। एक सच्ची सभ्यता के लिए मानव जाति द्वारा किए जा रहे इन सारे संघर्षों में, संवादों में हर जगह नेहरू की ऊँची शख़्सियत मौजूद है, भले ही भौतिक रूप से वे अब दुनिया में न हों। उनकी कमी पूरी दुनिया को खलती है, कितने सारे लोग सोचते हैं कि काश, नेहरू हमारे साथ होते… इसीलिए, आज इस बेचैन दुनिया में नेहरू अभी भी हमारे साथ हैं।

Dr. Martin Luther King Jr. and Mrs. Coretta Scott King with PM Jawaharlal Nehru
Dr. Martin Luther King Jr. and Mrs. Coretta Scott King with PM Jawaharlal Nehru

संदर्भ

पुरुषोत्तम अग्रवाल, कौन हैं भारत माता?, राजकमल प्रकाशन
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वायकोम सत्याग्रह सामाजिक सुधार का संघर्ष https://thecrediblehistory.com/2024/11/vaikom-satyagraha-struggle-for-social-reform/ https://thecrediblehistory.com/2024/11/vaikom-satyagraha-struggle-for-social-reform/#respond Tue, 05 Nov 2024 07:44:46 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=9099 फरवरी में जेल से रिहा होने के बाद, गांधीजी ने एझावा नेता   टी.के. माधवन और नई शुरू की गई मातृभूमि से जुड़े एक नायर शिक्षक के. केलप्पन  के आग्रह पर खुद को सत्याग्रह में शामिल कर लिया।  टी.के. माधवन और  के. केलप्पन  दोनों ही वैकोम में गठित अस्पृश्यता विरोधी समिति का हिस्सा थे।

 1924 में त्रावणकोर राज्य के कोट्टयम  स्थित  वायकोम शिव मंदिर के मार्ग पर नारायण गुरु और कुमारन अशान ने ब्राह्मणों के नियमों को तोड़ते हुए कदम बढ़ाए। उन्हें शराब पिए हुए सवर्णों ने जबरन हटाकर अपमानित किया क्योंकि वे पिछड़ी जाति से थे। 1884 में एक सरकारी आदेश द्वारा यह रास्ता सभी जातियों के लिए खोल दिया गया था, हालांकि सवर्णों ने इसके खिलाफ अपील की थी।

1924 में जब वायकोम सत्याग्रह आंदोलन धीरे-धीरे जनता के बीच अपनी पहचान बना रहा था, एक अन्य आंदोलन इसे विफल करने के लिए शुरू किया गया। यह सत्याग्रह विरोधी आंदोलन “कुछ ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण हिंदुओं” द्वारा आयोजित किया गया था। इसके प्रवर्तकों ने वायकोम सत्याग्रह के स्वयंसेवकों को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए उच्च जातियों के गुंडों को तैनात किया। इन्हें तत्कालीन त्रावणकोर सरकार का मौन समर्थन प्राप्त था।

उनका सामाजिक प्रतिबंध लागू था। एझवा और पुलय जाति के लोग पहले से सार्वजनिक सड़कों पर चलने के अधिकार की मांग कर रहे थे। त्रावणकोर के दीवान आंदोलनकारियों के पक्ष में थे, पर ब्राह्मण इसके खिलाफ थे। इस समय एसएनडीपी योगम केवल एझवा तक सीमित न रहकर केरल की सभी निम्न-पिछड़ी जातियों के धार्मिक-सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला संगठन बन चुका था। यह आंदोलन केवल रास्ते पर चलने के अधिकार से आगे बढ़कर वायकोम मंदिर में प्रवेश तक जा पहुंचा, हालांकि यह मुख्यतः मानवीय बराबरी के अधिकार का संघर्ष था।


भील आंदोलन के नायक मोतीलाल तेजावत


जब टी. के. माधवन महात्मा गांधी से मिले

महात्मा गाधी और टी.के. माधवन
महात्मा गाधी और टी.के. माधवन

 23 सितंबर 1924 को, निम्न जातियों की ओर से योगम के प्रतिनिधि   टी. के. माधवन ने महात्मा गांधी से मुलाकात की। इस बातचीत से आंदोलनकारियों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच संवाद स्थापित हुआ, और कांग्रेस ने आंदोलन में भाग लिया। छुआछूत के खिलाफ आवाज बुलंद हुई। मार्च 1924 में, मंदिर के आसपास के तनाव के बावजूद, पिछड़ी और निम्न जातियों के लिए मंदिर प्रवेश के उद्देश्य से सत्याग्रह शुरू हुआ।

इस सत्याग्रह में कई सवर्ण भी शामिल हुए। उल्लेखनीय है कि सत्याग्रहियों में पंजाब से आए अकालियों का एक समूह भी था, जिसने भोजन की व्यवस्था की। गांधी ने इस सत्याग्रह का समर्थन करते हुए आह्वान किया कि हिंदू समाज को छुआछूत के पाप से मुक्त होना चाहिए।

नारायण गुरु ने वायकोम सत्याग्रह का समर्थन किया। कहा जाता है कि उनके और गांधीजी के बीच यह विवाद हुआ कि मंदिर प्रवेश अहिंसक तरीकों से होना चाहिए या बलपूर्वक। यह स्पष्ट है कि इस सत्याग्रह ने जातियों के बीच सामाजिक दूरी मिटाने और सामाजिक उदारता के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आंदोलन में पेरियार ई.वी. रामास्वामी भी मद्रास से आकर शामिल हुए। तर्कवादी पेरियार के रूप में खुद को सम्मानित करने के लिए किस्मत में, पेरियार ने सत्याग्रह में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके लिए कारावास का सामना किया। नवंबर 1925 में, उन्होंने वैकोम में एक बड़ी सार्वजनिक सभा की अध्यक्षता की, जहाँ संघर्ष के प्रतिभागियों और समर्थकों ने गांधीजी की यात्रा के बाद तय की गई शर्तों को स्वीकार कर लिया। इस तरह, सत्याग्रह में विवाद और संवाद दोनों ही थे। नारायण गुरु ने सत्याग्रह स्थल पर गांधीजी के स्वास्थ्य के लिए सार्वजनिक रूप से प्रार्थना भी की।

वैकोम की यात्रा से पहले उन्होंने यंग इंडिया (19 फरवरी 1925) में लिखा था : ‘वैकोम सत्याग्रही स्वराज से कम महत्वपूर्ण लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं।’

गांधीजी जब मार्च 1925 में केरल आए, तो उन्होंने नारायण गुरु से मुलाकात की और पूछा, ‘क्या स्वामी जी का सत्याग्रह के संबंध में कोई भिन्न मत है?’ नारायण गुरु ने उत्तर दिया, ‘मुझे लगता है कि सब कुछ सही चल रहा है, और इसमें कुछ जोड़ने या बदलने की आवश्यकता नहीं है।’ इस सुधार आंदोलन की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि यह अपनी वैचारिक उग्रता में भी अहिंसक बना रहा।

नारायण गुरु ने गांधीजी से सहमति जताई कि ‘हिंसा अच्छी चीज नहीं है।’ यह आंदोलन सवर्ण गुंडागर्दी, भीतरघात, और अंग्रेजों की चालाकी भरी उदासीनता के कारण ‘कुचल दिया गया।’ गांधीजी के प्रयास असफल रहे और उन्हें बातचीत के दौरान नंबूदिरि ब्राह्मणों के अपमान का सामना करना पड़ा। इस आंदोलन में केरल की ब्राह्मणवादी कट्टरता का भयंकर रूप उजागर हुआ।

गांधीजी को टकराव की भयंकरता देखकर पीछे हटना पड़ा और तत्काल कोई समाधान नहीं निकल सका। हालांकि आंदोलन विफल रहा, लेकिन जातिगत दीवारें दरकने लगीं। अंततः मंदिर प्रवेश 1935 में संभव हो सका। उस युग के संघर्षों में आज की तरह आत्मप्रदर्शन का कोई स्थान नहीं था; वे पूर्णतः सच्चे मन से किए गए थे।


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महात्मा गांधी का आह्वान

महात्मा गांधी के अनुसार, उद्देश्य बिना हिंसा का सहारा लिए अपने लक्ष्य को प्राप्त करना होना चाहिए।

मार्च 1925 में सत्याग्रहियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “हमें इस संघर्ष को सख्त अहिंसा के रास्ते पर आगे बढ़ाना चाहिए, यानी व्यक्तिगत रूप से कष्ट सहना चाहिए। सत्याग्रह का यही अर्थ है।” गांधीजी ने सत्याग्रहियों को याद दिलाया, “जब आप कष्ट में हों, तब भी आपके मन में अपने विरोधियों के प्रति कोई कटुता नहीं होनी चाहिए, उसका कोई निशान भी नहीं रहना चाहिए।”

उन्होंने उन्हें प्रोत्साहित करते हुए यह भी कहा कि उनका कार्य “यांत्रिक” नहीं होगा। इसके विपरीत, उन्होंने यह चाहा कि सत्याग्रही अपने विरोधियों के प्रति प्रेम की भावना रखें। उन्होंने समझाया कि ऐसा करने का तरीका यह है कि विरोधियों को उनके उद्देश्य की ईमानदारी के लिए वही श्रेय दें, जिसका वे स्वयं के लिए दावा करते हैं।

गांधीजी ने कहा, “यदि आप सत्याग्रह की प्रभावकारिता में विश्वास रखते हैं, तो आप इस धीमी यातना और पीड़ा में आनंद अनुभव करेंगे।”

महात्मा गाधी और नारायण गुरु
महात्मा गाधी और नारायण गुरु

महादेव देसाई का विवरण

महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई ने अपनी पुस्तक द एपिक ऑफ त्रावणकोर में तत्कालीन रियासत में अस्पृश्यता उन्मूलन के संघर्ष को दस्तावेजी रूप में प्रस्तुत किया है।

सरोजिनी नायडू  द्वारा लिखित इस पुस्तक के दो भाग हैं—पहले भाग में संघर्ष का सारांश देने वाले सात अध्याय शामिल हैं, जबकि दूसरे भाग में गांधीजी द्वारा त्रावणकोर में दिए गए 27 भाषण संकलित हैं। वैकोम में सत्याग्रह की कठिनाइयों को याद करते हुए, देसाई, जो गांधीजी के साथ वहां गए थे, ने उल्लेख किया कि संघर्ष की उग्रता पूरी तरह से रूढ़िवादी ताकतों के पक्ष में थी।

देसाई ने लिखा, “उन्होंने पूर्वाग्रह की दीवार तोड़ने और सुधार के मार्ग को खोलने के प्रयासों का विरोध करने की कोशिश की।” उन्होंने कहा, “यहां वायकोम सत्याग्रह के विभिन्न चरणों या उस अकेले युद्ध में संघर्षरत बहादुर लोगों द्वारा झेली गई पीड़ा और बलिदान का वर्णन करना असंभव है।”

इसके बाद, देसाई ने सत्याग्रहियों की पीड़ा और उनके बलिदान को उजागर किया। उन्होंने लिखा, “सत्याग्रहियों को न केवल कई मौन पीड़ाओं से गुजरना पड़ा, बल्कि उन्हें रूढ़िवादियों के हाथों सामाजिक बहिष्कार और अपने परिवार के सदस्यों की निर्दयता का सामना भी करना पड़ा। उनमें से कुछ को पारिवारिक संपत्ति में उनके हिस्से से वंचित करने की धमकियां भी मिलीं।” उन्होंने आगे कहा, “वे बिना विचलित हुए आगे बढ़ते रहे, जबकि हर क्षण निराशाजनक घटनाएं घट रही थीं और संघर्ष कभी समाप्त होता नहीं दिख रहा था।”

गांधीजी ने हर स्तर पर आंदोलन पर सावधानीपूर्वक नजर रखी और उसे पोषित किया। गांधीजी की नौ दिवसीय यात्रा के अंत में, रियासती अधिकारियों ने अपने कदम पीछे खींच लिए, फिर भी कई महीनों बाद, नवंबर 1925 में, एझावा और ‘अछूतों’ सहित सभी लोग मंदिर की सड़कों पर चलने में सक्षम हो गए।

महात्मा गाधी और के. केलप्पन
महात्मा गाधी और के. केलप्पन

संदर्भ

शंभुनाथ, भारतीय नवजागरण : एक असमाप्त सफर, वाणी प्रकाशन 2022

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बिहार के ‘लेनिन’ शहीद जगदेव प्रसाद के संघर्ष की कहानी https://thecrediblehistory.com/2024/10/story-of-struggle-of-bihars-lenin-martyr-jagdev-prasad/ https://thecrediblehistory.com/2024/10/story-of-struggle-of-bihars-lenin-martyr-jagdev-prasad/#respond Tue, 15 Oct 2024 08:04:41 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=8768 कुछ लोग अपने जीवनकाल में ही व्यक्ति से विचारधारा बन जाते हैं। उनकी महानता इस तथ्य में निहित होती है कि चाहे वे जीवित रहें या न रहें, उनकी जीवन-यात्रा शाश्वत प्रकाश बनकर इतिहास को प्रकाशित करती रहती है। ऐसी ही महान विभूतियों में एक नाम है, जगदेव प्रसाद। उनका संपूर्ण जीवन शोषण, उत्पीड़न, अन्याय, अत्याचार, विभेद और विषमता के खिलाफ संघर्ष में बीता। इन्हीं गुणों और विशेषताओं के कारण उन्हें ‘बिहार लेनिन’ कहा गया।

उन्होंने कहा था, “मैं जो लड़ाई की नींव आज डाल रहा हूँ, वह लंबी और कठिन होगी, लेकिन जीत हमारी ही होगी।”

 

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को बिहार के गया जिले (अब अरवल) के कुर्था प्रखंड के कुरहारी गाँव में एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता, प्रयाग नारायण, के पास मात्र तीन बीघा ज़मीन थी, और वे मिडिल तक शिक्षित थे। उनकी माँ, रासकली देवी, अनपढ़ थीं। निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे जगदेव प्रसाद  ने बचपन से ही संघर्ष की राह अपनाई।

पिता चाहते थे कि जगदेव शिक्षक बनें ताकि वे घर के खर्च में सहयोग कर सकें, लेकिन जगदेव की इच्छा उच्च शिक्षा प्राप्त करने की थी। इसके लिए उन्होंने बी. टी. हाई स्कूल, जहानाबाद में नामांकन कराया और तमाम कठिनाइयों के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखी। बरसात के दिनों में उन्हें नदी तैरकर स्कूल जाना पड़ता था। विद्यार्थी जीवन के दौरान ही उनका विवाह सत्यरंजना देवी से हुआ, जो एक कुशल गृहिणी थीं, लेकिन शिक्षा से वंचित थीं।

जगदेव प्रसाद बचपन से ही अन्याय के खिलाफ विद्रोही स्वभाव के थे। उन्होंने सामाजिक अन्याय और जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू कर दी थी। हाई स्कूल जाते समय जब उच्च जाति के लोग उन पर तंज कसते, तो एक दिन उन्होंने धूल झोंक कर अपना प्रतिवाद किया। इस घटना के कारण उनके पिता को पाँच रुपये जुर्माना भरना पड़ा, लेकिन यह उनकी विद्रोही प्रवृत्ति का एक छोटा उदाहरण मात्र था।

उस समय बिहार, विशेषकर मध्य बिहार, में गरीबी और मजदूरी अधिनियम जैसे कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सरकारी शिथिलता थी। जमींदारों के अत्याचारों से दलित और पिछड़े समाज के लोग बुरी तरह पीड़ित थे। उच्च जातियों का आतंक था, और दलित तथा पिछड़ी जातियों को झूठे मुकदमों में फँसाया जाता था। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार आम बात थी, और ‘डोला प्रथा’ जैसी कुप्रथाएँ प्रचलित थीं। इन अत्याचारों ने जगदेव प्रसाद को झकझोर कर रख दिया।

 


नसुड़ी यादव, जिन्होंने चेतना का व्याकरण बदल दिया


जगदेव प्रसाद
जगदेव प्रसाद

राजनीतिक जीवन और ‘बिहार लेनिन’ का उदय

पिछड़ों और दलितों की दुर्दशा देखकर शिक्षक जगदेव हमेशा गुमसुम और परेशान रहते थे। पढ़-लिखकर समझदार हो जाने के बाद उनका दुःख और बढ़ गया था। वे सोचते थे कि सदियों से सताए जा रहे गरीबों को इज्जत की जिंदगी कैसे मिलेगी? इस समुदाय की बहू-बेटियों की आबरू की रक्षा कौन करेगा? देश आजाद है, लेकिन देश की 90 प्रतिशत दलित और पिछड़ी जनता को आजादी कैसे मिलेगी?

इन्हीं सवालों के जवाब खोजते हुए, जगदेव प्रसाद आसपास के देहाती इलाकों में उत्पीड़ित और दलित समुदाय की विद्रोही भावना को आवाज देने लगे। उनकी राजनीतिक सोच और समझ विकसित होने लगी।

जगदेव प्रसाद को लगा कि सोशलिस्ट पार्टी ही शोषितों और पीड़ितों के हितों की रक्षा कर सकती है। अतः वे अध्यापन कार्य को त्यागकर पटना चले आए और सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। शोषित और पीड़ित लोगों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति की दयनीयता को देखकर उन्हें जगाने की सोच ने जगदेव प्रसाद को पत्र-पत्रिकाओं का सहारा लेने के लिए प्रेरित किया।

1953 में, जगदेव प्रसाद सोशलिस्ट पार्टी की पत्रिका ‘जनता‘ के संपादक बने। ‘जनता’ के माध्यम से वे सामंतों के चक्रव्यूह में फँसे शोषितों को बाहर निकालना चाहते थे। दुर्भाग्यवश, उसी वर्ष सोशलिस्ट पार्टी दो भागों में बँट गई। जगदेव प्रसाद ने लोहिया का साथ दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें ‘जनता’ के संपादक पद से हटा दिया गया।  1955 में, जगदेव प्रसाद हैदराबाद जाकर वहाँ से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक ‘उदय’ का संपादन करने लगे। उनके निर्भीक और स्वतंत्र विचारों के कारण उन्हें कई धमकियाँ मिलीं, लेकिन वे अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे। उनके संपादन काल में दोनों साप्ताहिकों की प्रसारण संख्या लाखों में पहुँच गई। बाद में, पत्रों के मालिकों से मतभेद होने के कारण, उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और पटना लौट आए।

 1967 में, उन्होंने कुर्था विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीते। सामंती ताकतों और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके आंदोलनों के कारण उनका नारा “संसोपा ने बाँधी गाँठ, पिछड़े पावें सौ में साठ” प्रसिद्ध हुआ। 1967 में, पिछड़ों को उचित स्थान न मिलने के कारण उन्होंने ‘शोषित दल’ नामक नई पार्टी बनाई। उनका विश्वास था कि यह लड़ाई लंबी और कठिन होगी, लेकिन जीत हमारी ही होगी।

 


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अंतिम संघर्ष और शहादत

1974 में, बिहार की राजनीति में फैले भ्रष्टाचार और कांग्रेसी कुशासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने छात्रों के आंदोलन की अगुवाई की। जगदेव प्रसाद इस आंदोलन के समर्थक थे, लेकिन उन्होंने इसे गाँव-गाँव तक ले जाने की आवश्यकता महसूस की।

5 सितंबर 1974 को सत्याग्रह के दौरान कुर्था में पुलिस ने उन पर गोलियाँ चला दीं। गोली लगने के बाद भी उन्होंने पुलिस की बर्बरता के खिलाफ खड़े रहने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें घायल अवस्था में घसीटते हुए थाने ले जाकर मार डाला। जगदेव प्रसाद  की शहादत की खबर ने देश भर में दलित और पिछड़े वर्गों में शोक की लहर दौड़ा दी।

6 सितंबर को पटना के विधायक क्लब में उनके शव को आम जनता के दर्शनार्थ रखा गया। 7 सितंबर को उनकी शव यात्रा में उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश सहित देश भर से लाखों लोग शामिल हुए। जगदेव प्रसाद  का जीवन संघर्ष और क्रांति की कहानी है। उन्होंने दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया और समाज में अमिट छाप छोड़ी। उनकी शहादत ने उन्हें अमर बना दिया।

 समाचार पत्रों ने अपने 8 सितंबर के अंक में लिखा था कि ‘देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की शव यात्रा के बाद पहली बार किसी नेता की शव यात्रा में इतने लोग शामिल हुए हैं।’

जगदेव प्रसाद का जीवन उन संघर्षों और क्रांतियों की कहानी है, जिन्होंने बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया। उन्होंने दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और एक अमिट छाप छोड़ी। वे आज भी एक विचारधारा के रूप में जीवित हैं, और उनकी शहादत ने उन्हें अमर बना दिया है।

जगदेव प्रसाद
जगदेव प्रसाद

संदर्भ

अशोक कुमार सिन्हा, बिहार के महानायक, प्रभात प्रकाशन 2021

Dr. Rajendra Prasad Singh, Jagdev Prasad Vangmay,SamyakPrakashan,2018

 

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जब टैगोर ने जताई थी गांधी के विचारों से असहमति https://thecrediblehistory.com/2024/10/when-tagore-expressed-disagreement-with-gandhis-ideas/ https://thecrediblehistory.com/2024/10/when-tagore-expressed-disagreement-with-gandhis-ideas/#respond Wed, 09 Oct 2024 09:06:51 +0000 https://thecrediblehistory.com/?p=8646 जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधीजी  ने अंग्रेज़ों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी थी । आंदोलन का नाम था असहयोग आंदोलन । आंदोलन को पूरे भारत में काफी सफलता मिली लेकिन गोरखपुर के चौरी चौरा में एक भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिस वालों की मौत हो गई। गांधीजी ने इस घटना के बाद आंदोलन को वापस ले लिया ।

गांधीजी  को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया । लेकिन फरवरी 1924 में उनके खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया । बाहर आकर गांधीजी ने ‘चरखा आंदोलन’ शुरू कर दिया।

रवींद्रनाथ टैगोर गांधीजी के समय के काफी मशहूर कवि थे। उन्होंने गांधीजी के न सिर्फ चरखा आंदोलन और असहयोग आंदोलन पर बल्कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भी लेख लिखकर आलोचना की। उन्होंने लिखा कि जैसे कुछ लोगों के लिए उनकी आजीविका है वैसे ही कुछ लोगों के लिए राजनीति है जहां वो अपने देशभक्ति की विचारधारा का व्यापार करते हैं।

रवीन्द्रनाथ ने जब यह देखा कि पूरे जोश खरोश के साथ असहयोग आंदोलन  शुरू हो रहा है, तो वे ऐसा लिखने के लिये बाध्य हुए-सारे भारत में उस समय हलचल मची हुई थी — कहीं ख़िलाफ़त के नाम पर, कहीं पंजाब की नृशंसता के कारण शरीर से दुर्बल भारतवासियों के लिए इस तरह उन्मत्त होना कितना हानिकर हो सकता है, यह सोचकर रवीन्द्रनाथ शंकित हुए।

उन्होंने चाहा कि लोग असंभव प्रतिकार करने का ख़याल छोड़कर और बदला लेने की इच्छा स्थगित रखकर इस समय इस महान् देश की मनोरचना में लग जायें। गांधीजी के विचारों और कार्यों में आत्मत्याग की जो प्रज्वलित वह प्रतिफलित हैं, उसके लिए रवीन्द्रनाथ के मन में असीम श्रद्धा का भाव है (2 मार्च 1921) को लिखे एक पत्र में उन्होंने इस संबंध में विस्तारपूर्वक लिखा था- जिसमें असहयोग की नयी निषेधात्मक नीति के प्रति उनके मन में वैसी ही उपेक्षा का भाव था।

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गांधीजी के असहयोग आंदोलन पर टैगोर 

स्वराज क्या है! माया है, धुंध है जो कि खुद खत्म हो जाएगा उस अविनाशी पर बिना कोई असर डाले।  हालांकि हम अपने आप इस झूठ का विश्वास दिला सकते हैं कि स्वराज हमारा उद्देश्य नहीं है । हमारी लड़ाई आध्यात्मिक लड़ाई है। यह लोगों के लिए है। हमें लोगों को उनकी खुद की अज्ञानता से मुक्त कराना होगा ।हमें तितली को यह विश्वास दिलाना होगा कि आकाश की स्वतंत्रता कोकून के शरण से बेहतर है।

नेशनलिज़म या राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर ने कहा कि हमारी भाषा में ‘नेशन’ के लिए कोई शब्द नहीं है ।जब हम दूसरों ये शब्द उधार लेते हैं तो यह हमारे लिए सटीक नहीं बैठता।

(मई 1921 में ‘माडर्न रिव्यू’ में प्रकाशित)

टैगोर द्वारा असहयोग आंदोलन की आलोचना में गांधी जी का उत्तर

मैं समझता हूं कि कवि ने अनावश्यक रूप से असहयोग आंदोलन के नकारात्मक पक्ष को उभारा है । हमने ‘न’ कहने की शक्ति खो दी है । सहयोग न करना ऐसा ही है जैसे खेत में बीज बोने से पहले किसान खरपतवार को साफ करता है। खरपतवार को साफ करना काफी ज़रूरी है । यहां तक कि जब फसल बढ़ रही हो तो भी ये ज़रूरी होता है । असहयोग का अर्थ है कि लोग सरकार से संतुष्ट नहीं हैं।

देश ने गैर- नुकसानदायक, प्राकृतिक और धार्मिक असहयोग का रास्ता चुना है न कि हिंसा का अधार्मिक रास्ता और, अगर देश कभी भी कवि के स्वराज को प्राप्त कर पायेगा तो यह   असहयोग और अहिंसक आंदोलन से ही होगा।

(1 जून 1921 को ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित किए गए आर्टिकिल ‘द पोएट ऐंक्ज़ाइटी’ से)

इसके उत्तर में गांधीजी ने कहा, ग्रहण और त्याग, जीवन में दोनों की एक जैसी ज़रूरत है, दोनों को लेकर ही मनुष्य के सारे उद्यम हैं-उपनिषद् की अंतिम बात भी निषेधात्मक है, और ब्रह्म की संज्ञा बतलाते हुए उपनिषदों के ऋषि कहते हैं ‘नेति’ । बहुत दिनों से भारत ने ‘ना’ कहने की सामर्थ्य खो दी थी, वही सामर्थ्य उन्होंने भारत को लौटा दी है। ‘बीज बोने के पहले कुदाल चलाना पड़ता है, मिट्टी से गंदगी निकाल देनी पड़ती है ।’

गांधीजी और टैगोर के बारे में टिप्पणी करते हुए नेहरू ने कहा था कि कोई भी दो व्यक्ति इतने अलग नहीं हो सकते जितने गांधीजी और टैगोर । दोनों एक ही विचार और संस्कृति से प्रेरित थे फिर भी आपस में इतने अलग-अलग थे। यह भारतीय संस्कृति की खासियत है जिसने एक ही समय में दो इतने विपरीत विचारधारा वाले और महान लोगों को जन्म दिया। जाने-माने फ्रेंच लेखक रोमेन रोलैंड ने इसे ‘द नोबल डिबेट’ कहा था।


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सत्याग्रह गांधीजी के तरकश में एक प्रभावी तरीका था

गांधीजी  के तरकश में सत्याग्रह का एक और प्रभावी तरीका था, जिसमें आर्थिक बहिष्कार भी शामिल था। इसका अर्थ था विदेशी उत्पादों का बहिष्कार और उनके स्थान पर स्थानीय रूप से उत्पादित वस्तुओं का प्रयोग। गांधीजी के अनुसार, विदेशी वस्त्र बहिष्कार योग्य वस्तुओं में शामिल थे। इसलिए, 1920-22 के दौरान उन्होंने हिंदुस्तान में विदेशी कपड़ों के विनाश का आह्वान किया। जुलाई 1921 में, गांधीजी  ने स्वयं मुंबई में विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का शुभारंभ किया।

गांधीजी का विचार था कि  विश्व की जटिल परिस्थितियों में सामाजिक बहिष्कार की अत्यंत सीमित प्रासंगिकता है। इसे केवल अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में ही अमल में लाना चाहिए, जब कोई उद्धत (विद्रोही) अल्पमत, बहुमत को किसी सिद्धांत के बजाय सिर्फ चुनौती देने के उद्देश्य से खारिज कर दे। सामाजिक बहिष्कार को तभी लागू किया जाना चाहिए जब यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि इसे सजा के रूप में न देखा जाए। ‘यदि इसके द्वारा लक्षित व्यक्तियों को असुविधा होती है, तो उसके दर्द की अनुभूति लक्ष्य साधकों के दिलों में होनी चाहिए।’

सारे देश में जगह-जगह विदेशी कपड़ों की होली जलने लगी और चरखा गूंजने लगा। कुछ ने शुद्ध खादी का व्रत लिया, जिसे लोगों ने अपनी अंतिम सांस तक निभाया।

राजनीतिक क्षेत्रों में, बहिष्कार सविनय अवज्ञा का रूप धारण कर लेता है। इसके अंतर्गत उपाधियों और सम्मानों की वापसी, और जो लोग लोकप्रिय इच्छाओं को अभिव्यक्त नहीं करते, उनसे सभी प्रकार की सेवाओं का इंकार शामिल है। मतदाताओं को तथाकथित प्रतिनिधियों के चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने से पूरी तरह अलग हो जाना चाहिए। असहयोग में शामिल जनता इन प्रतिनिधियों के राजनीतिक जुलूस या जलसों में हिस्सा नहीं लेगी। इस प्रकार, उनके प्रति किसी भी प्रकार का सम्मान व्यक्त नहीं किया जाएगा।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर
Tagore

गांधीजी ने ध्वंस की नैतिकता शीर्षक से लेख लिखा

1921 के अगस्त महीने में जब गांधीजी  के नेतृत्व में बंबई में बहुत से मूल्यवान विदेशी वस्त्रों की होली जल रही थी, रवीन्द्रनाथ के मित्र एंड्रज के आग्रहपूर्ण अनुरोध के उत्तर में गांधीजी  ने ‘ध्वंस की नैतिकता’ शीर्षक एक लेख लिखा था ( 1 सितंबर, 1921), उसमें उन्होंने लिखा था –

जनता के क्रोध का रुख मनुष्यों से हटाकर वस्तुओं की ओर मोड़ रहे हैं।” लेकिन वे यह नहीं समझते कि जनता का क्रोध धीरे-धीरे बढ़ रहा है, और वे सोच रहे हैं, “पहले वस्तुओं को नष्ट कर दें, फिर मनुष्यों पर आक्रमण करेंगे।”

वे उस समय भी यह नहीं समझ पाए कि केवल तीन महीनों के भीतर ही जनता उसी बंबई में नरसंहार पर उतारू हो जाएगी। मनुष्य की जो पाशविक प्रवृत्ति आमतौर पर सोई रहती है,गांधीजी  उससे बहुत अधिक मुक्त हैं; वे अत्यधिक पवित्र और साधु हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि आज जो लोग अधीरता से उनकी बातों को स्वीकार कर रहे हैं, उन्हीं के बीच पाशविक प्रवृत्ति घात लगाए बैठी है।


सरदार पटेल मां की तरह गांधीजी का ख्याल रखते थे


रवीन्द्रनाथ ने किया था अविवेकी या निष्ठुर बर्बादी

रवीन्द्रनाथ अधिक दूरदर्शी थे, उन्होंने इसे असहयोगियों की धृष्टता कहाँ।  टैगोर आंदोलन एवं विरोध प्रदर्शन के विपरीत रचनात्मक कार्यक्रम को विशेष महत्व प्रदान करते थे जिसके कारण उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के विपरीत गांधीजी  को रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने की बात अपने पत्र में कही। असहयोग आंदोलन के दौरान  रवीन्द्रनाथ  टैगोर ने विदेशी वस्त्रों को जलाये जाने को ‘अविवेकी या निष्ठुर बर्बादी’ कहा था।

यद्यपि असहयोगी लोगों ने बड़ी आंतरिकता के साथ अहिंसा की बात कही है, लेकिन साथ ही वे यूरोप के पाप के बारे में जनता को लगातार आगाह भी करते जा रहे हैं और इस तरह वे जनता के मन में भी उस कीटाणु का संचार करते जा रहे हैं, जो किसी-न-किसी दिन हिंसा का आश्रय लेकर रहेगा

 लेकिन जिनका चित्त विद्वेष की सारी भावनाओं से मुक्त है, वे धर्म प्रचारकगण इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं। जो लोगों को कर्मक्षेत्र में उतार रहे हैं, अपने हृदय की धड़कन सुनने से उनका काम न चलेगा, उनहें सिर्फ़ दूसरों के हृदय की ही सुननी पड़ेगी जनता से सावधान रहना चाहिये। जब उन पर नशा चढ़ेगा तो किसी गांधीजी का नैतिक आदेश उन्हें बाँधकर न रख सकेगा।

बेशक, केवल एक संभावना है, जिसके द्वारा जनता बिना सोचे-विचारे नेता की कठोर व्यवस्था को मानने को राजी हो सके अगर नेता अपने को ईश्वर का अवतार घोषित करना स्वीकार कर ले। जनता की छिपी इच्छा भी यही है-लोग तो आज ही गांधीजी को श्रीकृष्ण के रूप में चित्रित कर रहे हैं। लेकिन गांधीजी में जो आंतरिकता और विनय है, उसके कारण ऐसे काम के लिए स्वीकृति देना उनके लिए संभव नहीं है।

अतः जो कुछ बाक़ी रह जाता है, वह है उनका अकेला स्वर, जो एक पवित्रतम मनुष्य का स्वर है और जो गरजते तरजते मानव समुद्र के ऊपर विचरण करता है और कितने दिनों तक वह अपना स्वर सुना पायेगा? कैसी महान कैसी करुण प्रतीक्षा है!

Gandhi-Tagore
Gandhi- Baa- Tagore

 


संदर्भ

Gangeya Mukherji, Gandhi and Tagore, Politics, Truth and Conscience, Taylor & Francis, Publisher

Rudrangshu Mukherjee, Tagore & Gandhi Walking Alone, Walking Together, Aleph Publisher

 

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