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क्या 55 करोड़ रुपये के लिए हुई थी गांधीजी की हत्या.. – The Credible History
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क्या 55 करोड़ रुपये के लिए हुई थी गांधीजी की हत्या..

 

 

गोडसे और उसके अनुयायी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि गांधीजी  हत्या का फ़ैसला पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिए जाने के लिए गांधीजी  के उपवास के बाद लिया गया। तथ्य इसका दो स्तरों पर खंडन करते हैं।

पहला तो यह कि गांधी की हत्या की कोशिशें तीस के दशक में उनके अस्पृश्यता विरोधी अभियान के दौर में ही शुरू हो गई थीं। 25 जून 1934 को पूना (अब पुणे) में एक आयोजन के सिलसिले जाते हुए नगरपालिका के पास उनकी गाड़ी पर बम फेंका गया थाा जिसमें वह बाल-बाल बचे थे। प्यारेलाल और जगन फड़नीस सहित कई लोगों की मान्यता है कि यह हमला हिन्दू महासभा द्वारा किया गया था, गोडसे और आप्टे पूना में हिन्दू महासभा के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से थे।

22 जुलाई 1944 को पंचगनी में पूना से आए बीसेक युवकों के एक समूह ने गांधी पर हमले की कोशिश की थी जिनमें नाथूराम सहित गांधी हत्या षड्यन्त्र के अभियुक्त नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, दिगम्बर भड़गे और गोपाल गोडसे शामिल थे। इस घटना पर टिप्पणी करते हुए कपूर आयोग ने लिखा था- ‘पूना में एक ऐसा अतिरेकी समूह है जो गांधी का विरोधी है और जो राजनैतिक हत्याएं करने में झिझकता नहीं।’ ज़ाहिर है 55 करोड़ का मसला गांधी हत्या को सही ठहराने के लिए बहुत चतुराई से उठाया गया था और थोड़ी गहराई से छानबीन करें तो समझ आता है कि यह मामला उनकी हत्या का कारण हो ही नहीं सकता था।

 

55 करोड़ रुपये कोईअनुदान नहीं था

पहली बात तो यह कि यह राशि कोई अनुदान नहीं थी। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए बँटवारे के बाद भारत के रिजर्व बैंक में नक़दी का भी बँटवारा होना था। यहाँ यह बता देना प्रासंगिक होगा तब यह तय हुआ था कि अक्टूबर 1948 तक यह दोनों देशों के केन्द्रीय बैंक के रूप में काम करेगा। इसी प्रक्रिया में बनी एक कमेटी ने बैंक में उस समय रखे रुपयों का बंटवारा किया था और उस समझौते पर दोनों सरकारों ने हस्ताक्षर किया था।

 

इसी कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर रिजर्व बैंक के खाते के 400 करोड़ रुपयों में से पाकिस्तान की हिस्सेदारी 75 करोड़ तय की गई। यह गांधी ने तय नहीं किया था। समझौते पर हस्ताक्षर सरदार पटेल और नेहरू के थे और में इसकी पहली किस्त यानी 20 करोड़ रुपये विभाजन के समय हँसी-ख़ुशी देकर बाक़ी 55 करोड़ जब कुछ समय बाद या पाकिस्तान की मांग पर देने का समझौता हुआ था।

 

यह दो आज़ाद देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत हुआ समझौता था। समझौते में किसी तरह की कोई शर्त नहीं रखी गई थी। समझौते के दो घंटे बाद भारत ने अपनी तरफ़ से शर्त जोड़ी कि इस समझौते का पालन कश्मीर पर समझौते पर निर्भर होगा। लेकिन पाकिस्तान ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया। ज़ाहिर है, दो देशों के बीच नेताओं के हस्ताक्षर से हुआ समझौता ही अंतर्राष्ट्रीय पटल पर मंज़ूर होगा।

 

1947 के अंत में ही, पाकिस्तान द्वारा कोई मांग किये जाने से पहले रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर सर सी डी देशमुख ने भारत के वित्त मंत्रालय को एक पत्र लिखकर यह पैसा 3 करोड़ की किस्तों में देने का सुझाव दिया था। ज़ाहिर है, रिज़र्व बैंक नियमों के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा था। लेकिन उस समय वित्त मंत्रालय ने कोई भी राशि देने से मना कर दिया।[i] अक्टूबर के महीने में कश्मीर पर हमला होने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। अब पाकिस्तान ने जब इस राशि की माँग की तो नेहरू और पटेल ने धनराशि देने से फ़िलहाल के लिए मना कर दिया। 7 जनवरी को केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सर्वसम्मति से पाकिस्तान को यह राशि फ़िलहाल न देने का फ़ैसला किया गया।[ii]

 

पाकिस्तान का वित्त मंत्रालय रिज़र्व बैंक को यह याद दिला रहा था कि वह दोनों देशों का केन्द्रीय बैंक है और इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह एक ज़िम्मेदार संस्था की तरह व्यवहार करे और वायदे के अनुसार बची हुई राशि पाकिस्तान को उपलब्ध कराये और ऐसा न करने पर कार्यवाही की धमकी दे रहा था।[iii]

12 जनवरी को जब उन्होंने मौन व्रत के दौरान अनशन का निर्णय लिया तो 55 करोड़ का मामला कहीं उनके सामने था ही नहीं, न ही उन्होंने किसी को कोई राय दी थी। उन्होंने अनशन से पहले जो शर्तें रखीं थीं उसमें भी कहीं 55 करोड़ का जिक्र नहीं था। अनशन की घोषणा 12 जनवरी की जिस प्रार्थना सभा में की गई उसमें भी 55 करोड़ का कहीं ज़िक्र नहीं था।

 

गांधीजी के उपवास का कारण

उपवास का कारण सीमा के दोनों तरफ़ जारी हिंसा बताते हुए उन्होंने तो यह भी कहा था – अगर पाकिस्तान में दुनिया के सब धर्मों के लोगों को सामान हक़ न मिले, उनकी जान और माल सुरक्षित न रहे और भारत भी उसी की नक़ल करे तो दोनों का नाश सुनिश्चित है।[iv]

 

अनशन का कारण बताते हुए अपने पुत्र देवदास गांधी को उन्होंने जो पत्र लिखा उसमें भी कहीं 55 करोड़ का जिक्र नहीं है।[v] फिर पूना में बैठे नथूराम को कहाँ से सपना आया कि गांधी 55 करोड़ के लिए उपवास कर रहे हैं!

 

12 जनवरी 1948 को ही प्रार्थना सभा के बाद वह माउंटबेटन से मिलने गए। मुलाक़ात पहले से तय थी। वहाँ हुई बातचीत में कैबिनेट के इस निर्णय को माउंटबेटन ने राजनैतिक रूप से कमज़ोर और अविवेकपूर्ण बताया जो भारत के लिए पहली असम्मानजनक कार्यवाही बन जाएगा। यही बात उन्होंने अगले दिन मिलने आये पटेल से कही। पटेल नाराज़ भी हुए और माउंटबेटन से शिकायत करने भी पहुँचे। लेकिन माउंटबेटन ने अपनी राय से सिर्फ़ ‘असम्मानजनक’ हटाने की बात मानी और संशोधित राय गांधी को भेज दी।[vi]

 

यहाँ एक और तथ्य दे देना ज़रूरी लग रहा है- 13 जनवरी को गोडसे का भडगे से हथियारों का सौदा हुआ और डिलीवरी अगले दिन बम्बई में हिन्दू महासभा के दफ़्तर में लेने की बात तय हुई। उसी दिन सुबह गोडसे ने 3000 और 2000 रुपयों के अपने बीमे का नॉमिनी क्रमशः गोपाल गोडसे की पत्नी सिन्धु और आप्टे की पत्नी चम्पा को बनाने के लिए बीमा कम्पनी को पत्र लिखा।[vii]

 

यह दो वजहों से मज़ेदार तथ्य है, पहला तो यह कि ये पालिसियाँ दो साल पहले ही ली गई थीं। देखें तो उस समय अख़बार की आर्थिक दशा चौपट थी और अविवाहित गोडसे के पास न तो इन्हें ख़रीदने के लिए अतिरिक्त धन था न कोई वजह।

ज़ाहिर है कि लम्बे समय से चल रही योजना के तहत ये क़दम उठाया गया था। दूसरा आप्टे की जगह उसकी पत्नी को नॉमिनी बनाना तो समझ में आता है लेकिन गोपाल की जगह उसकी पत्नी को नॉमिनी बनाए जाने से यह बात निकलकर आती है कि 13 जनवरी की सुबह उसे यह पता था कि गोपाल भी षड्यंत्र का हिस्सा बनने जा रहा है।

मालगाँवकर सहित अनेक लेखक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि गांधी की अनशन की घोषणा के बाद नथूराम और आप्टे ने गांधी-हत्या की योजना बनाई। अब 12 जनवरी की शाम को मिली ख़बर के बाद अगर यह योजना बनी थी तो गोपाल के साथ बन्दूक की बात कब तय हो गई थी कि अगले दिन सुबह ही नथूराम ने यह निर्णय ले लिया? ज़ाहिर है कि गांधी हत्या की योजना उनके अनशन के बाद नहीं बनी, बल्कि वे इसके लिए जिस अवसर की तलाश कर रहे थे वह अनशन की वजह से उन्हें मिल गया था।


संदर्भ-स्त्रोत

[i] देखें, द वायर में प्रकाशित अनुज श्रीवास का लेख – द मेसी पार्टीशन ऑफ़ रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया https://thewire.in/banking/partition-reserve-bank-of-india

[ii] देखें, पेज 462, पटेल : अ लाइफ, राजमोहन गाँधी,  बारहवाँ संस्करण, नवजीवन, अहमदाबाद -2017

[iii] देखें, द वायर में प्रकाशित अनुज श्रीवास का लेख – द मेसी पार्टीशन ऑफ़ रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया https://thewire.in/banking/partition-reserve-bank-of-india

[iv] देखें, पेज 84-89,अंतिम झाँकी, मनुबेन गाँधी, अखिल भारतीय सर्वसेवा संघ, काशी – 1960

[v] देखें, पेज 230-31, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गाँधी, खंड 98 ( गाँधी आश्रम सेवाग्राम द्वारा प्रकाशित)

[vi] देखें, पेज 463, पटेल : अ लाइफ, राजमोहन गाँधी,  बारहवाँ संस्करण, नवजीवन, अहमदाबाद -2017

[vii]देखें, पेज 124, द मेन हू किल्ड गांधी, मनोहर मालगांवकर, लोटस कलेक्शन, रोली बुक्स, दिल्ली – 2019

Editor, The Credible History

जनता का इतिहास, जनता की भाषा में

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